गली की कीमत
मैं दिल्ली की जिस गली में रहती हूँ, वह हमारे एरिया की सबसे चौड़ी गलियों में गिनी जाती है. आज
से 15 साल पहले जब मैंने इस मकान को ख़रीदा था, तब इसका चौड़ी गली में होना भी इसे खरीदने का एक बहुत बड़ा कारण था. आज मेरे मकान की कीमत अच्छी खासी है पर इस चौड़ी गली में मकान होने की जो कीमत मुझे और मेरे परिवार को चुकानी पड़ती है उसका अंदाज़ा शायद ही किसी को हो.
जब हम यहाँ रहने आये थे तब इस गली की रंगत ही कुछ और ही थी. सर्दियों में हमारी चौड़ी गली में घरों के आगे चारपाइयाँ
बिछती थी जिस पर बैठ कर सारी
गली की औरतें धूप सेंकती थी, स्वेटर बुनती थी और गप्पे मारती थी. गर्मियों में गली के सभी बच्चे
देर शाम तक गली में खेलते थे. फिर धीरे धीरे हमारी गली में रहने वालों को इसके चौड़े होने का एक और बहुत
बड़ा फायदा नज़र आया. अब उन्होंने बहुमंजिले घर बनवा लिए जिनकी ऊपर की
मंजिलों पर तो वे खुद रहने लगे और ग्राउंड फ्लोर पर उन्होंने बड़ी बड़ी दुकाने बना दी, जिन में तरह तरह का सामान बिकता है. अब सारा दिन हमारी गली में गाड़ियों की रेलमपेल रहती
है. दिन में उन लोगों की गाड़ियाँ आती है जो यहाँ शौपिंग करने आते है और रात में उन लोगों की गाड़ियाँ खड़ी होती हैं, जो यहाँ रहते हैं. यानी हमारी चौड़ी गली
अब संकरी हो गयी है. जब से ये दुकाने खुली हैं तब से हमारी गली
की औरतों ने गली में धूप सेंकना बंद कर दिया है. अब वे सारे दिन
अपने घर के अन्दर ही बंद रहती हैं. कभी गली में आते जाते अगर हमारी गली की दो औरते मिल जाती हैं तो बस एक दूसरे का अभिवादन करके निकल जाती हैं. रुक कर बात नहीं करती. अब हमारी गली commercial जो
हो गयी है. अब ऐसे गली में खड़े होकर बात करना अच्छा नहीं लगता.
अब बच्चों के खेलने के लिए कोई जगह ही नहीं बची. पार्क हमारे घर से दूर है और वहाँ वैसे भी शाम को असामाजिक तत्व डेरा जमा लेते है. गली में भी बच्चे खेल नहीं सकते. खेले कैसे? जगह ही नहीं है और अगर वे कभी किसी तरह से खेलना भी चाहे तो इसी डर से नहीं खेलते कि उनकी गेंद से
किसी दुकान का
शीशा टूट जायेगा. दुकाने रात साढ़े आठ बजे बंद
होती हैं. तब तक बच्चों में खेलने की उर्जा ही नहीं बचती. बच्चे
मन मसोस कर रह जाते है.
अक्सर लोग मुझे कहते है कि
तुम तो बाज़ार में रहती हो. तुम्हे तो बड़ा आराम है.कोई भी चीज़ खरीदने के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता. तुम्हे
तो कुछ भी लेना हो तो बस
घर से उतरो और ले आओ. ये बात सुनकर मेरी पीड़ा और भी बढ़ जाती है क्योंकि उन्हें क्या पता कि बाज़ार में रहने की कितनी बड़ी कीमत मैं और मेरे बच्चे चुका रहे है. कभी कभी मन करता है कि इस गली को छोड़ कर किसी और चौड़ी गली में घर ले लूँ पर क्या पता वहां भी लोग उस चौड़ी गली का वही फायदा उठाये जो हमारी इस गली के लोगों ने उठाया.
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