बस अब और ज़ुल्म नहीं
फिर एक तीन महीने की मासूम बच्ची अपने पिता के कथित अमानवीय ज़ुल्मों का शिकार होकर दुनिया से चल बसी. बेटे की चाह में अँधा पिता अपने आँगन में बेटी का होना बर्दाशत नहीं कर पाया और उसने अपनी बच्ची को इतना पीटा कि वह चल बसी. मात्रतीन महीने की ये बच्ची जो अभी तक अपनी छोटी छोटी आँखे पूरी तरह से खोल कर दुनिया को देख भी न पायी थी, अपने ही पिता के ज़ुल्मों का शिकार होकर सदा के लिए आँखे मूँद कर दुनिया से कूच कर गयी.
ये हवानियत कुछ समय पहले हुई दो वर्षीया बच्ची बेबी फलक की दर्दनाक मौत की याद दिला गयी. बेबी फलक भी इसी तरह की अमानवीयता की शिकार होकर चल बसी थी. बच्ची के जिस्म पर पड़े चोटों के निशान उस अबोध बच्ची पर ढाये ज़ुल्मों की दास्तान चीख चीख कर कह रहे थे. वाकई मानव के रूप में राक्षस ही होते हैं वो लोग जो इस तरह मासूम बच्चियों पर इस तरह ज़ुल्म ढाते हैया फिर मार देते है. उनके दिल और दिमाग में किस तरह की गन्दी सोच होती होगी जो वे इस तरह का वहशियाना काम करने पर अमादा हो जाते है. ये कैसी विडम्बना है कि एक तरफ तो हमारे देश में लड़कियां वायुसेना के
हवाई ज़हाज़ चला कर, बड़ी बड़ी कंपनियों के ऊँचे पदों पर आसीन होकर सफलता के नए सोपान अर्जित कर रही हैं, अपना, अपने माता पिता और देश का नाम ऊँचा कर रहीं हैं. वहीँ दूसरी तरफ हमारे ही देश में बेटियाँ मार दी जाती हैं. कई बार तो उन्हें जन्म लेने का मौका भी नहीं दिया जाता. मां की कोख में ही मार दिया जाता है और अक्सर ये कुकृत्य करवाने वाले उस बच्ची के अपने ही होते है. एक ऐसे देश में जहां सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर स्त्रियाँ काबिज़ है. बेटियों को इस तरह जान बूझ कर मार दिया जाना निश्चित रूप से अति निंदनीय और हैवानियत से भरा कृत्य है.
एक तरफ तो हम स्त्री को सम्मान देने की बात करते है, महिला सशक्तिकरण की बात करते है, स्त्री शक्ति को सलाम करते है वहीँ दूसरी ओर हममे से कुछ लोग ऐसे भी है जो अभी भी लड़कियों को बोझ ही मानते है. जिस दिन से ये पता चलता है कि घर में बेटी का आगमन होने वाला है उसी दिन से उनके माथे पर चिता की लकीरें पड़ने लगती है. और ऐसा सिर्फ ग्रामीण अंचलों और कस्बों में ही नहीं है.
पढ़ा लिखा और कथित रूप से विकसित तबका भी इस सामाजिक बुराई से घिरा हुआ है. कहीं कहीं ये बात भी लोगों के मन को मथने लगती है कि हम बेटी को पढ़ा लिखा कर योग्य बना कर एक पराये लड़के के हाथों सौंप देंगे. लेकिन बेटे को पढ़ाएंगे लिखाएंगे तो वह योग्य होकर जो कमाएगा वो घर में ही लायेगा. यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है और वो ये है कि ये ज़रूरी नहीं कि मासूम बच्चियों पर ज़ुल्म ढाने वाले सभी लोग पुरुष ही हो. उनमे कोई स्त्री भी हो सकती है. कहा जाता है कि स्त्री ने हमेशा पुरुष की दासता सही है. लेकिन ऐसा भी है कि पुरुष को स्त्री पर राज करने देने में भी कहीं न कहीं स्त्री का ही हाथ रहा है. अक्सर ये देखने में आता है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है. जहां एक तरफ बहूँ को परेशान करने में सास ननद का हाथ रहता है वहीँ ऐसी भी सासें और ननदें हैं जो अपनी बहुओं की झूठी गवाही के कारण निर्दोष
होते हुए भी जेल की सज़ा काट रही हैं. अभी भी ऐसी माएं है जो ईश्वर से प्रार्थना
करती हैं कि हे ईश्वर मुझे एक बेटा ज़रूर देना. बहूँ के उम्मीद से होते ही अक्सर
घर की बड़ी बूढी औरतो को ये कहते सुना जाता है कि बहूँ को पहले पहल बेटा हो जाये,
बस फिर कोई चिंता नहीं है फिर दूसरा बच्चा भी बेटा हो जाये तो सोने पर सुहागा लेकिन अगर बेटी भी हो
तो कोई बात नहीं. यानी हर हाल में बेटा होना बहुत ज़रूरी है. अब सवाल उठता
है कि ऐसा क्यों है? शायद ऐसा इसलिए है कि वर्षों पुरानी मान्यताएं कहीं न कहीं
अभी भी हमें जकड़ें बैठीं हैं और हम इन्हें चाह कर भी पूरी तरह से छोड़ नहीं पा
रहे है. इस सन्दर्भ में बिहार के धरहरा गाँव का उदाहरण विचारणीय होने के साथ प्रशंसनीय भी है. बिहार के इस गाँव में बेटी के पैदा होने पर दस फलदार पेड़ लगाये जाते है. इसका सीधा सा मतलब है कि बेटी पैदा होने पर हर घर में ख़ुशी मनाई जाती है और साथ ही ये कामना भी की जाती है कि बच्चियां भी इन फलों के पेड़ो की तरह ही फले और फूले और उनकी ख्याति इन फलों की खुशबू की तरह दूर दूर तक फैले. जब बिहार के एक गाँव के लोग जागरूक होकर समझदारी भरा कदम उठा सकते है तो हमें भी उनसे प्रेरणा लेते हुए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे. (भ्रूण हत्या से जुड़े कानूनों को और भी ज्यादा सख्त बनाने की ज़रूरत है लेकिन उससे भी बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि इस सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए स्त्री पुरुष दोनों ही सामान रूप से प्रयास करें. ताकि फिर कभी
किसी मासूम पर कोई ज़ुल्म न हो और भारत के हर गाँव और शहर में कल्पना चावला जैसी बेटियां पैदा होकर भारत का नाम रोशन करें. भारत के हर हिस्से में फलदार पेड़ लगे और हरियाली आये.) परिवार की शोभा संतान से होती है फिर ये बात मायने नहीं रखती की वह संतान बेटा है या बेटी. अगर बेटियाँ ही नहीं होंगी तो बुआ, मौसी के रिश्ते अपनी पहचान खो देंगे. बेटी नहीं होगी तो बेटे की शादी के समय बेटी के द्वारा निभाई जाने वाली रस्में कौन निभाएगा और सबसे बड़ी बात कि अगर बेटी को मार देंगे तो बेटो के लिए बहु कहाँ से लायेंगे?
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