Monday, July 30, 2012

apne baare main bhi sochen


अपने बारे में भी सोचे

                 अक्सर जब भी आप फ्रिज खोलती हैं  तो उसमें  रखे फलों को देखकर सोचती हैं कि आज तो मैं फल ज़रूर खाऊँगी पर फिर भूल जाती हैं परन्तु बच्चों, पति और परिवार के अन्य सदस्यों को फल खिलाना बिलकुल नहीं भूलतींखाना बनाते समय पति और बच्चों की पसंद का तो पूरा ख़याल रखती हैं पर अपनी पसंद भूल जाती हैं. मेहमानों के आने पर  बाज़ार  से झटपट टिक्की और रसगुल्ले मंगवा लेती हैं पर कभी जब अपना मन टिक्की और रसगुल्ले खाने  को कर रहा होता है तो मन को मार लेती हैं. बच्चे अगर छोले भटूरो की फरमाइश करते हैं तो आप अगले ही दिन बना देती है पर जब आपका खुद का मन छोले भठूरे खाने का कर रहा होता  है तो उसे आज कल पर टालती रहती हैं.  
                बच्चों को नियम से दूध और बादाम देती हैं क्योंकि आप जानती हैं कि बादाम खाने से दिमाग तेज़ होता है और दूध पीने से सेहत अच्छी होती है परन्तु आप खुद कभी दूध और  बादाम नहीं लेती. ऐसा भी नहीं है कि आपको कोई रोकता है. अरे भई घर आपका है तो रोक टोक कैसीपर फिर भी आप ऐसा क्यों करती हैं?
                  अक्सर देखा गया है कि महिलायें जितनी अपने घर के सदस्यों की सेहत और खाने के मामले में उनकी पसंद नापसंद के प्रति सजग होती हैं, अपनी सेहत और खाने के मामले में अपनी पसंद नापसंद के प्रति उतनी ही लापरवाह होती हैं
                     इस बारे में 32  वर्षीय  विवाहिता निधि बताती है कि  मुझे चाकलेट बहुत पसंद है. जब भी मेरे बच्चे चौकलेट खाते है तो मैं कभी कभी उनसे एक बाईट  लेकर खा लेती हूँ   परन्तु बच्चे होने के बाद मैंने  शायद ही कभी अपने लिए अलग से चोकलेट खरीद कर खायी हो. कारण पूछने पर वह कहती हैं कि ऐसा भी नहीं हैं कि मुझे चौकलेट खरीदने की मनाही है परन्तु मैंने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं  कि मुझे  अपने बारे में  भी सोचना चाहिए. वहीँ  35 वर्षीया गुंजन बताती हैं कि कभी अगर खाने में कोई डिश  बच्चों या  पति को पसंद जाती है तो वह अपने हिस्से की डिश  भी उन्हें दे देती है. वे कहती है कि ऐसा करके  उन्हें  अच्छा लगता है. जबकि 40   वर्षीया  नूतन का कहना है कि बच्चों को समय पर और पौष्टिक खाने की हमसे ज्यादा ज़रूरत है क्योंकि यह उनके शरीर के विकास के लिए बहुत ज़रूरी है. हमारा क्या है, हमारी तो आधी ज़िन्दगी बीत चुकी है.
                      परिवार के प्रति  समर्पण  होना अच्छी बात है परन्तु आप अपने बारे में भी सोचिये. याद रखे कि आप अपने परिवार की धुरी हैं, आप खुद स्वस्थ रहेंगी तो ही अपने परिवार को स्वस्थ  रख पाएंगी इसलिए परिवार के साथ साथ  अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखे क्योंकि पहला सुख तो निरोगी काया ही होता है. बाकी सारे सुख तभी सुख देते हैं जब उन्हें महसूस करने वाला  तन और मन स्वस्थ होता है.सोचिये कि अगर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देने के कारण आप बीमार हो जाती हैं तो आपके साथ साथ आपका परिवार भी तो परेशान होगा
                    इसी तरह खाना खाने के मामले में अपने मन की भी सुने. कभी कभी मन की मान भी लेअपने शरीर और मन के प्रति भी हमारे कुछ कर्तव्य होते है, उनकी अनदेखी करें.   
                  अगर आप अपने हिस्से की डिश बच्चों को दे देती है और वे खा लेते है परन्तु जब उन्हें पता चलेगा कि मम्मी ने खुद खाकर वो डिश हमें ही खिला दी तो यकीन मानिये, उन्हें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा और फिर वह अगली बार इसी डर से कोई चीज़ दुबारा मांगने से कतरायेंगे क्योंकि अब वे जानते है कि आप अपने हिस्स्से की चीज़ भी उन्हें दे देती हैं  इसलिए जब भी कभी ऐसा मौका आये कि बच्चे आपसे कोई ऐसी खाने की चीज़ मांगे जो मात्रा में थोड़ी कम  हो तो भले ही कम बचाए पर अपने लिए भी  बचाए ज़रूर. ऐसा करके आप अपने मन के साथ भी न्याय करेंगी और अपने बच्चों के मन के साथ भीहम आपको स्वार्थी होने के लिए बिलकुल नहीं कह रहे हैं परन्तु याद रखे सभी की तरह ये जीवन आपको भी एक ही बार मिला है इसलिए परिवार के सदस्यों की छोटी छोटी ज़रुरतो का ध्यान रखने के साथ साथ अपने तन और मन की  भी छोटी छोटी ज़रुरतो का ध्यान रखे  क्योंकि गया समय लौट कर नहीं आता.कहीं ऐसा हो कि समय बीतने पर आप ये कहे कि अगर मैंने समय पर अपने ऊपर ध्यान दिया होता तो कितना अच्छा होता.