देखती हूँ
देखती हूँ जब भी किनारे तोडती नदी को,
सोचती हूँ क्यों तोडा नहीं मैंने मन की सीमाओं को।
छूने देती इसे आसमान की ऊँचाइयों को,
जैसे नदी छूती है अपनी गहराइयों को।
उछलता कूदता जाता तू अपनी डगर,
जैसे जाती है नदी अपने सफ़र।
और अंत में समा जाती है सागर की बाहों में,
तू भी चला आता यूँही मेरी पनाहों में
पारुल
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