इस सच्चाई को भी समझे
आज हम महिला दिवस मना रहे है। जगह जगह छोटे बड़े आयोजन हो रहे है जिसमें हम महिलाओं की आज़ादी की बात कर रहे है। साथ ही स्त्री शक्ति को सलाम भी कर रहे है। निश्चित रूप से पिछले सौ सालों में स्त्री की स्थिति में भारी बदलाव आया है. वह बंधन तोड़ कर आज़ादी की सांस ले रही है.
वह पुरुष के कंधे से कन्धा मिलकर चल रही है. बल्कि कुछ मामलों में तो पुरुष से आगे है. पुरुषों के वर्चस्व वाले ऐसे कितने ही क्षेत्र है जहां अब स्त्रियाँ अपनी उपस्थिति दर्शा रही है, फिर चाहे वह बार टेंडिंग का कम हो या ऑटो चलने का. आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जहाँ स्त्री ने अपना परचम न लहराया हो.चाहे सत्ता हो , व्यापर हो या बैंकिंग, स्त्री सभी जगह ऊँचे पदों पर आसीन है.
हम कहते है कि अब स्त्री आज़ाद है. पर क्या कभी हमने सोचा है कि स्त्री किसकी दास्ताँ से मुक्त हुई है? क्या पुरुष की? शायद ये सच भी हो. पर एक सच यह भी है कि अगर आज वह आगे बढ़ रही है तो उसमे पुरुष का भी हाथ है. पुरुष की मदद से ही स्त्री सफलता के नित नए सोपान छू रही है. वह मददगार पुरुष किसी भी रूप में हो सकता है. पिता, पति,भाई, बेटा,दोस्त, रिश्तेदार, यहाँ तक की बॉस या कलीग भी.
कई बार स्त्री पुरुष , दोनों को ही लगता है कि हमें एक दूसरे की ज़रूरत नहीं.जबकि ऐसा नहीं है. स्त्री पुरुष दोनों ही एक दूसरे के पूरक है. दोनों का ही एक दूसरे के बिना कोई वजूद नहीं है. न तो अकेली स्त्री कुछ कर सकती है और न ही अकेला पुरुष.
इसलिए आज ज़रूरत इस बात की नहीं कि स्त्री को महान और पुरुष को उसके आगे बौना बनाने की कोशिश की जाये बल्कि ज़रूरत इस बात की है कि भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाया जाये जहां स्त्री पुरुष दोनों ही समान हो और दोनों को ही समान अधिकार प्राप्त हो जिससे दोनों ही देश की तरक्की में समान योगदान दे सकें.
आज हम महिला दिवस मना रहे है। जगह जगह छोटे बड़े आयोजन हो रहे है जिसमें हम महिलाओं की आज़ादी की बात कर रहे है। साथ ही स्त्री शक्ति को सलाम भी कर रहे है। निश्चित रूप से पिछले सौ सालों में स्त्री की स्थिति में भारी बदलाव आया है. वह बंधन तोड़ कर आज़ादी की सांस ले रही है.
वह पुरुष के कंधे से कन्धा मिलकर चल रही है. बल्कि कुछ मामलों में तो पुरुष से आगे है. पुरुषों के वर्चस्व वाले ऐसे कितने ही क्षेत्र है जहां अब स्त्रियाँ अपनी उपस्थिति दर्शा रही है, फिर चाहे वह बार टेंडिंग का कम हो या ऑटो चलने का. आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जहाँ स्त्री ने अपना परचम न लहराया हो.चाहे सत्ता हो , व्यापर हो या बैंकिंग, स्त्री सभी जगह ऊँचे पदों पर आसीन है.
हम कहते है कि अब स्त्री आज़ाद है. पर क्या कभी हमने सोचा है कि स्त्री किसकी दास्ताँ से मुक्त हुई है? क्या पुरुष की? शायद ये सच भी हो. पर एक सच यह भी है कि अगर आज वह आगे बढ़ रही है तो उसमे पुरुष का भी हाथ है. पुरुष की मदद से ही स्त्री सफलता के नित नए सोपान छू रही है. वह मददगार पुरुष किसी भी रूप में हो सकता है. पिता, पति,भाई, बेटा,दोस्त, रिश्तेदार, यहाँ तक की बॉस या कलीग भी.
कई बार स्त्री पुरुष , दोनों को ही लगता है कि हमें एक दूसरे की ज़रूरत नहीं.जबकि ऐसा नहीं है. स्त्री पुरुष दोनों ही एक दूसरे के पूरक है. दोनों का ही एक दूसरे के बिना कोई वजूद नहीं है. न तो अकेली स्त्री कुछ कर सकती है और न ही अकेला पुरुष.
इसलिए आज ज़रूरत इस बात की नहीं कि स्त्री को महान और पुरुष को उसके आगे बौना बनाने की कोशिश की जाये बल्कि ज़रूरत इस बात की है कि भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाया जाये जहां स्त्री पुरुष दोनों ही समान हो और दोनों को ही समान अधिकार प्राप्त हो जिससे दोनों ही देश की तरक्की में समान योगदान दे सकें.
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