Tuesday, September 4, 2012

karm hi puja hai


   कर्म ही पूजा है
                                 
                              
पिछले दिनों  घर  के पास के मंदिर में कई दिनों बाद जाना  हुआ. अभी मंदिर की सीढियाँ  चढ़ ही  रही थी कि एक बुज़ुर्ग सज्जन , जो मुझे जानते थे, मिल गए. हाल चाल  पूछने के बाद बोले कि तुम रोज़ मंदिर क्यों नहीं आती? मेरे लिए ईश्वर का नाम सदा मन में धारण करना रोजाना मंदिर आने से  ज्यादा महत्वपूर्ण है  इसलिए मैंने कहा कि मैं घर पर ही ईश्वर का नाम ले लेती हूँ . मेरा इतना कहना था कि उन्होंने वहीँ  सीढियों में मेरी कक्षा ले डाली. वे मुझे  मंदिर आने पर लगने वाले पुण्य के बारे में  बताने लगे. वे तो मंदिर जाये बिना अन्न जल भी ग्रहण नहीं करते थे. वे मुझे भी रोज़ मंदिर आने के लिए इन्सिस्ट करने लगे. उनकी बातों से लग रहा था  जैसे रोज़ मंदिर  जाकर मैं कोई पाप करती हूँ . पहले तो मैं अपराधी सी सिर  झुकाए उनकी बातें सुनती रही . फिर जब मुझसे रहा गया तो मैंने बड़े सम्मान के साथ उनसे पूछा कि  आप रोज़ मंदिर क्यों आते हैं? पहले तो उन्हें कुछ सूझा  पर फिर कुछ सोच कर वे बोले, मैं मंदिर आता हूँ  प्रभु के दर्शन करने और मन की शांति के लिए.
                              
मुझे देर हो रही थी इसलिए उनसे विदा लेकर  मैं  सीढियाँ  चढ़कर  मंदिर पहुंची. ईश्वर के दर्शन भी किये, पर यही सोचती रही कि क्या  सिर्फ मंदिर  जाने  भर से मन की शांति  प्राप्त हो जाती है? क्या मंदिर में आकर  हम अपने अंदर उमड़ घुमड़ रहे अच्छे बुरे विचारों से निजात पा जाते है? क्या ईश्वर के सामने खड़े होकर भी हमारा मन भटकता नहीं है? क्या पूजा या जाप करते समय हम मन से ईश्वर को समर्पित होते है? शायद नहीं. क्योकि मन तो हमारा ऑफिस के काम में भटक रहा होता है या दोपहर के खाने की प्लानिंग कर रहा होता है. नहीं तो उस दिन किये जाने वाले कामों की लिस्ट बना रहा होता है. यानि कही कही सांसारिक कार्यो में  लिप्त होता है. तो फिर मंदिर आकर भी  वह शांत कहाँ हुआ?
                             
चित्त की शांति हम पर निर्भर करती है. चित्त की शांति मंदिर आने भर से नहीं, अपने आप को संयत और व्यवस्थित रखने से होती हैयदि हम अपने  प्रत्येक काम में  अपना 100% दे, अपनी तरफ से हर किसी से मीठे वचन बोलने की कोशिश करें, किसी को जानबूझ कर दुःख पहुचाएं  तो चित्त सदा शांत रहेगा. मंदिर जाना या जाना किसी का निजी फैसला है. इसे किसी पर भी लादना ठीक नहीं. रोज़ मंदिर जाने से प्रभु हम पर ज्यादा प्रसन्न नहीं होंगे और ही जाने से रुष्ट हो जाएँगे. और रही बात ईश्वर के दर्शन की, तो वह तो कण कण में है. हमारे अपने अंदर है. उनके दर्शन तो हम कभी भी कर सकते  है. बस ज़रूरत होती है  मन की आँखों से उन्हें देखने की. ईश्वर तो एक नन्हे बच्चे की निश्छल मुस्कान में  भी बसते है औए बुजुर्गो के आशीर्वाद  में  भी होते है.
                           
इस सन्दर्भ  में  मुझे एक घटना भुलाये  नहीं भूलती. कॉलेज में  एक बार हमारी लगभग  55 वर्षीया अंग्रेजी की लेक्चरर  ने अपनी क्लास थोड़ी  जल्दी खत्म  करने की बात कही क्योंकि उन्हें घर जाना था. मैं उनसे काफी घुली मिली थी. मैंने उनसे जल्दी घर जाने का कारण पूछा तो वे बोली कि  आज वे बहुत थक गयी थी, सुबह उन्हें कॉलेज के काम से कही जाना था और उसके बाद  लगातार  क्लासेस  इतनी  थी कि आज उन्हें सुबह से कुछ भी खाने की फुर्सत नहीं मिलीबस एक कप चाय ही पी थी और अब शाम के चार बज रहे थेवो नवरात्रों के दिन थे. तो मैंने उनसे पूछा की क्या उन्होंने नवरात्रे के व्रत  रखे है? तो वे बोली, नहीं, मैं व्रत नहीं रखती और किताबों  को माथे से लगा कर बोली, ज्ञान बांटना  ही मेरी  पूजा है. जब मैं पढ़ाती  हूँ तो मुझे लगता है कि मैं  भगवान् की पूजा कर रही हूँ .
                         
उन लेक्चरर  की कही बातों ने ज़िन्दगी का एक और सबक दिया कि रोजाना मंदिर जाने या जाने से नहीं, पूजा, व्रत या जाप करने या करने से नहीं  बल्कि अपने कर्मो को सही ढंग से  और साफ़ मन से करने पर ईश्वर हम पर ज़रूर प्रसन्न होते है

2 comments:

  1. सच बात है कर्म ही पूजा है------ पारूल जी

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