हौसलों की उड़ान
बहादुरी उम्र,धर्म और लिंग का भेद नहीं करती. इसके लिए ज़रूरत होती है सिर्फ हौसले और ज़ज्बे की. इस बात को एक बार फिर प्रमाणित कर दिखाया है पकिस्तान की एक 13 वर्षीय बहादुर मुस्लिम लड़की मलाला युसूफ जई ने. पाकिस्तान के मनोहारी प्रान्त स्वात घाटी की रहने वाली मलाला स्वात घाटी में लड़कियों के स्कूल जाने पर तालिबान द्वारा दो वर्ष पहले लगाये गए प्रतिबन्ध के कारण स्कूल जाने से वंचित हो गयी. अपनी इसी कसक और पीड़ा को मलाला ने बी बी सी उर्दू ऑनलाइन पर एक डायरी की शक्ल में बयान कर दिया.
उनकी इसी डायरी ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरूस्कार के लिए नामांकित करवा दिया जो बाल अधिकारों से जुड़ा सबसे प्रतिष्ठित पुरूस्कार है. आंठवी कक्षा में पढने वाली मलाला बयालीस देशों के तिरानवें प्रतियोगियों को पछाड़कर नामांकित हुईं . उनके साथ इस पुरूस्कार के लिए चार अन्य लड़कियां भी नामांकित हुई जिसमे पुरूस्कार मिला दक्षिण अफ्रीका की सत्रह वर्षीया मिकाईला माइक्रोफ्ट को .
उनकी इसी डायरी ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरूस्कार के लिए नामांकित करवा दिया जो बाल अधिकारों से जुड़ा सबसे प्रतिष्ठित पुरूस्कार है. आंठवी कक्षा में पढने वाली मलाला बयालीस देशों के तिरानवें प्रतियोगियों को पछाड़कर नामांकित हुईं . उनके साथ इस पुरूस्कार के लिए चार अन्य लड़कियां भी नामांकित हुई जिसमे पुरूस्कार मिला दक्षिण अफ्रीका की सत्रह वर्षीया मिकाईला माइक्रोफ्ट को .
परीक्षा में अव्वल रहने वाली और स्कूल की सभी सांस्कृतिक गतिविधियों में सबको साथ लेकर बढ चढ़ कर भाग लेने वाली मलाला भले ही इस पुरूस्कार को न जीत पायीं हो लेकिन वे इस पुरूस्कार को जीतने वाली मिकाईला माइक्रोफ्ट से बहुत प्रभावित हैं. मिकाइला खुद शारीरिक रूप से विकलांग होते हुए भी विकलांग बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं. मलाला के अनुसार इस पुरूस्कार को जीतने से ज्यादा उनका इसके लिए नामांकन होना मायने रखता
है. इस नामांकन ने उनका उत्साह दोगुना कर दिया है और वह मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा दिलाने की अपनी इस जंग को आगे भी जारी रखेंगी.
मलाला की डायरी में लिखी बातों से स्वात में तालिबान द्वारा किये अत्याचारों से किशोर होती लड़कियों की मनोव्यथा का अंदाज़ा बखूबी लगाया जा सकता है. मसलन अपनी डायरी के शुरूआती पेजों में उन्होंने लिखा है कि शायद वह अब स्कूल नहीं जा सकेंगी क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है कि उनके स्कूल की प्रधानाचार्या ने स्कूल में सर्दी की छुट्टियाँ घोषित तो कर
दी हैं लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि स्कूल दुबारा किस तारीख
से खुलेंगे. अपनी डायरी में ये सब मलाला ने तालिबान द्वारा लड़कियों के शिक्षित होने
पर पाबंदी लगाने के लिए विवश करने के अगले ही दिन यानी 14 जनवरी 2009 को लिखा है. गौरतलब है कि उस समय मलाला की उम्र सिर्फ 11 वर्ष की रही होगी.
उनकी डायरी में तालिबान द्वारा किये गए अत्याचारों को
लेकर उनकी अपने सहपाठियों के साथ की गयी चर्चा भी शामिल है. वे कहती है कि उस समय स्वात घाटी तालिबान के कब्ज़े में थी और तालिबान का विरोध करने वाले
दर्ज़नों लोगों को तालिबानी सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका देते थे. इन सब बातो से ज़ाहिर है कि मलाला किस कदर निर्भीक और बहादुर लड़की है जो बेख़ौफ़
होकर तालिबान के अत्याचारों के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कर रही है.
भविष्य में उनका इरादा शिक्षा के अधिकार से वंचित लड़कियों के लिए स्वात घाटी में एक वोकेशनल इंस्टीटयूट खोलने का है जिससे वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. साथ ही वह यह भी चाहती हैं कि लोग स्वात घाटी के लोगों को आतंकवादी न मानकर शांत और प्यारे लोगों के रूप में जानें.
मलाला का इस तरह
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इतने बड़े पुरूस्कार के लिए नामांकित होना साफ़ तौर पर पकिस्तान में जवान होती नई पौध के मनोभावों को दर्शाता है.
पाकिस्तान जैसे पिछड़े देश में जहां मुस्लिम लड़कियां अभी भी शोचनीय हालात में अपना जीवन व्यतीत
करती हैं , वहां स्वात घाटी में रहने वाली एक तेरह वर्षीय मुस्लिम लड़की मलाला युसूफ जई लड़कियों के स्कूल जाने पर
प्रतिबन्ध लगाने पर तालिबान के खिलाफ आवाज़ उठाने का दम रखती है और इसके लिए वह इन्टरनेट का सहारा भी लेती है.
ये उस लड़की की स्कूल जाने और पढने की ललक और उसकी जिजीविषा ही है जिसने उसे पाकिस्तान जैसे मुस्लिम कट्टरपंथी
देश में ऐसा करने का साहस दिया.साथ ही ये स्कूल जाने और शिक्षित होने का ही नतीजा है जो उसने अपनी बात को रखने के लिए इन्टरनेट का इस्तेमाल किया. बालकों के लिए नोबल पुरूस्कार
जितने प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरूस्कार के लिए पाकिस्तान की एक किशोरी का नामांकन पाकिस्तान की नयी पीढ़ी के हौंसलों और नाजायज़ बात का खुलकर विरोध करने वाली एक ऐसी युवापीढ़ी का प्रतीक है जो
आने वाले समय में पाकिस्तान को बदलने का माद्दा रखती
है.
published in Nai Dunia on 2.12.11
No comments:
Post a Comment