Wednesday, August 1, 2012

दान की सार्थकता
 
                      
कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के एक गाँव में बने प्रस्सिद्ध मंदिर में  जाने का मौका मिला. मंदिर ठेठ  गाँव में  था परन्तु काफी सुन्दर और सुरुचिपूर्ण  ढंग  से बना हुआ था. ज़ाहिर है, दान की रकम से ही बना थामंदिर में जगह जगह  दीवार पर, सीड़ियों पर, उसे बनवाने के लिए दान देने वाले दानी का नाम लिखा थापास ही एक और नए मंदिर का निर्माण हो रहा था जिसके लिए धन की आवश्यकता थी. वहाँ  पर एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था की 5100  रुपये से ज्यादा दान देने  वाले का नाम शिलापट्ट पर अंकित किया जाएगामंदिर की धरमशाला के प्रत्येक कमरे पर उसे बनवाने वाले दानी की  नामपट्टिका लगी  थी. ये सब देखकर अचानक ही एक पंक्ति याद गयी जो कभी कहीं पढ़ी थी. पंक्ति थी कि दान दो तो ऐसे दो कि दायें हाथ से दो  तो बाएं हाथ को  भी पता चलेलेकिन यहाँ तो दान के साथ साथ दान देने वाले को भी महिमामंडित किया जा रहा था. कितना विरोधाभास था. तो फिर कौन सी बात सही थी?जो मैंने किताब में  पढ़ी थी या जो मैं यहाँ देख रही थी.      
                   
फिर हम पास के गाँव में  बने एक पुराने मंदिर को भी देखने गए. गाँव में  थोडा अंदर होने और वहां  जाने का रास्ता खराब और थोडा गन्दा  होने के कारण वहां कम ही लोग जाते थेवहाँ जाने पर वहाँ के पुजारी ने हमारा स्वागत किया और बड़े प्रेम से हमें वह  मंदिर दिखाया और उसकी महत्ता भी बताईचलते समय उन्होंने हमें वहाँ  के कुँए से पानी भी पिलाया. हमने उन्हें भेंट स्वरुप कुछ पैसे देने चाहे जिसे उन्होंने  बड़े आदर के साथ लेने से इनकार कर दिया और कहा कि इन पैसो  से  किसी ज़रूरतमंद की मदद कर दीजियेगा या बच्चों मे मिठाई बाँट दीजियेगा.
                    
उनकी बात  का मुझ पर जादू का  सा  असर हुआ. मैंने लौटते समय पास की एक  दुकान से ढेर सारी टॉफियां खरीदी और  वहाँ  आस पास खेल रहे बच्चों में  बाँट दीवे बच्चे मुझे घेरे रहे और जब मैं वहां  से जाने लगी तो  हाथों मैं टॉफी लेकर दूर तक मुझे जाते  देख कर हाथ हिलाते रहे. उन बच्चों की निश्छल मुस्कान और आँखों की चमक मुझे वो संतोष दे गयी  जो शायद मंदिर में 500 रुपये दान  देकर भी नहीं मिलता.
                       
दान की सार्थकता उसके इस्तेमाल में  है. दान देना उसकी राशि पर नहीं बल्कि उस सहयोग और उससे सोल्व  होने वाले परपस  पर निर्भर करता है. ईश्वर सब जगह है. फिर एक ही जगह नए नए  मंदिर बनवाने से क्या लाभ? यदि किसी जगह पर एक मंदिर बना है तो वहा दूसरा नया मंदिर बनवाने की जगह उन पैसो से  अस्पताल या पाठशाला बनवा दी जाये तो वह भी तो भगवान् की पूजा ही हुई. हम मंदिर में  भी ज़रूर दान दे, मंदिर  का रख रखाव भी हमारी ही जिम्मेदारी है परन्तु ये भी देखे की वहाँ  उसकी ज़रूरत है भी या नहीं? अगर हमारी छोटी सी मदद किसी के चेहरे  पर मुस्कान ले  आती है तो ईश्वर भी हमसे ज़रूर खुश होता है
                                                                            

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