Tuesday, August 23, 2011

anna ki zarurat hamesha hai.

                        अन्ना की ज़रूरत हमेशा है.
           
              
आज पूरा देश अन्नामय हैं. अन्ना की इतनी लोकप्रियता का कारण यह है कि वह एक ऐसे मुद्दे को लेकर सरकार के विरुद्ध आन्दोलन कर रहे हैं जो वाकई हर आम आदमी की दुखती रग है.  भ्रष्टाचार एक ऐसा कीड़ा है जिससे हर व्यक्ति त्रस्त है. यहाँ तक की खुद भ्रष्टाचारी को भी अपना काम करवाने के लिए अपने पद या जनता से उगाहे  पैसे का प्रयोग करना पड़ता है.  परन्तु कई बार ऐसा होता है कि भ्रष्टाचार को फैलने देने में हम परोक्ष रूप से सहायता करते है क्योंकि किसी और को भ्रष्टाचार का शिकार  होता देख हम अपनी आँखे मूँद लेते है, ये सोचकर कि हम क्यों बिना बात ही बात के बीच में पड़कर मुसीबत मोल लें.
             ये बात मैंने अभी एक महीने पहले ही महसूस की. मैं अपने घर के लैंड लाइन  टेलीफोन का बिल जमा करने महानगर टेलीफोन निगम के दफ्तर गयी. दफ्तर में  बिल  जमा करवाने  वालों की लम्बी लाइन  थी.  खैर मैं भी लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतज़ार करने लगी. वहाँ  कई ऐसे भी लोग थे जो लोगों से कुछ शुल्क लेकर घर बैठे ही उनके बिल जमा करवा देते थे. ऐसे लोगों के पास बिलों की मोटी गड्डी थी. बिलिंग काउंटर पर बैठे सरकारी बाबू एक व्यक्ति से एक बार में अधिकतम दो ही बिल स्वीकार रहे थे. धीमे धीमे ही सही, पर लाइन खिसक रही थी.
            अचानक बिलिंग काउंटर के पास शोरगुल होने लगा. पता चला कि अन्दर बैठे बाबू ने एक व्यक्ति से एक बार में 6 बिल स्वीकार किये है जिसका पीछे लाइन में खड़ा एक व्यक्ति पुरजोर विरोध कर रहा था. उस व्यक्ति का आरोप था कि सरकारी बाबू उस व्यक्ति से रिश्वत खाते है तभी उसके 6 बिल उन्होंने स्वीकार किये है. यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह थी कि कतार में खड़ा एक भी व्यक्ति उस विरोध करने वाले व्यक्ति का खुल कर साथ नहीं दे रहा था. सरकारी बाबू और लाइन में खड़े उस व्यक्ति की बहस ने झगडे का रूप ले लिया और अन्दर बैठे सभी सरकारी बाबुओं ने अपने पेन वही रख कर रजिस्टर  बंद कर दिए और कहा कि खड़े रहिये सभी, अब इस दफ्तर में कोई काम नहीं होगा.
                 ये नज़ारा देखते ही कतार में खड़े सभी लोग उस विरोध करने वाले व्यक्ति को कोसने लगे कि उसे क्या ज़रूरत थी बहस करके सबके लिए मुसीबत मोल  की. जहां इतनी देर तक लाइन में लगे है वहाँ थोड़ा समय और सही. जैसे भी हो रहा था लेकिन काम हो तो रहा था. आपके विरोध करने से कितने लोगों का समय बर्बाद हुआ. लोगों ने किसी तरह सरकारी बाबुओं को शांत करके वापिस काम शुरू करवाया. वह विरोध करने वाला व्यक्ति सही होते हुए भी अपने आप को अपराधी महसूस कर रहा था. ये सब कुछ देखकर  मेरा भी मन ख़राब हो गया क्योंकि मैं भी विरोध न करके परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार को फैलने देने  में सहायक रही थी. जाते जाते मुझे उस विरोध करने वाले व्यक्ति के शब्द कान में पड़े कि इससे अच्छा तो अंग्रेजी राज था जिसमे कम से कम हम सब एकजुट तो थे.
                                                                                                                      parul jain

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