Thursday, August 20, 2015

         संस्कृति भूलते हम
सोमवार को तीज थी। माँ का फोन आया कि आज खीर पूरी बना लेना, लाल चूड़ियाँ पहन लेना, बनाव सिंगार कर लेना और मेहंदी लगवा लेना। मुझे ये सब थोड़ा अजीब लगा। खीर पूरी बनाना मतलब एक्स्ट्रा केलोरीज़ खाना और लाल चूड़ियाँ, बनाव सिंगार करना मतलब एक्स्ट्रा टाइम खर्च करना। सासू माँ के स्वर्गवासी होने और महानगर में एकल परिवार में रहने के कारण माँ ही मुझे इन सब रीति रिवाज़ों से समय समय पर अवगत कराती रहती हैं। पिछले दिनों सावन के दिनों में जब माँ मेरे घर पर आई थी तो भी मुझे सावन के कुछ गीत सुनाकर गयी थी। तो अनायास ही ये गीत मैं भी उनके साथ ही गुनगुनाने लगी थी। मुझे ये गीत सुनने में बड़े ही मधुर लगते है। माँ मुझे साथ में इन लोकगीतों का मतलब भी बताती रहती हैं। एक दिन उन्होंने मुझे कहा कि तुम भी इन गीतों को सीख लो। काम आएंगे। वो बताती हैं कि पार्क में रोज़ शाम को उनकी उम्र की महिलाएं इकठ्ठा होती हैं और वे सब मिलकर भजन या गीत गाती हैं। आजकल सावन हैं तो सावन के गीत गाती हैं जब फागुन आएगा तो फागुन के गीत गाएंगी। लेकिन वो साथ ही ये भी कहती है कि उनकी पीढ़ी के बाद कौन इन लोक गीतों को संजोयेगा ? क्योंकि उनके अनुसार आजकल की बहु बेटियो को तो इन गीतों में दिलचस्पी कम ही है। आजकल के बच्चे क्या जाने कि सावन के दिनों में मोर पपीहा बोलते है। आजकल के बच्चे तो बस ये जानते है कि सावन में पानी टिप टिप बरसता है जो आग लगा देता है। उनकी बात में भी दम था। उनकी कही बातों को सुनकर मैंने भी सोचा कि सच ही तो कह रही हैं वो। ये छोटे छोटे त्यौहार कैसे हमारे जीवन से निकलते जा रहे है हमें पता भी नहीं चल रहा। इनकी अहमियत बस मोबइल में सन्देश के आदान प्रदान जितनी ही रह गयी है। हम अपने रोजमर्रा के काम में इतने मसरूफ हो जाते है कि ये सब त्यौहार हमें बेकार का आडम्बर लगने लगते हैं। लेकिन अगर देखा जाए इन्ही तीज त्योहारों के ज़रिये ही तो हम अपनी संस्कृति से रूबरू होते हैं। ये त्यौहार हमें अपने रोज़ के उस बोझिल माहौल से बहार निकल कर तरोताज़ा होने का मौका देते हैं ध्यान दें तो हम पाते हैं कि किटी पार्टी में आयोजित छोटे छोटे तीज फ़ंक्शंस भी हमारे त्योहारों को बचाये रखने में छोटा सा योगदान देते है। पर्यटन मंत्रालय द्वारा आयोजित तीज मेले भी हमारी इसी संस्कृति को बचाये रखने की कोशिश है जिसे हम भूलते जारहे है। 
अंत में माँ द्वारा सुनाये एक लोक गीत की कुछ पंक्तियाँ
सावन आया अम्मा मेरी रंग भरा जी ,
एजी कोई आई हरियाली तीज,

 घर घर झूला झूले कामिनी जी  

Monday, June 22, 2015

sathi shabdon ki: desh ke swadisht Phal

sathi shabdon ki: desh ke swadisht Phal:                             देश के स्वादिष्ट फल डॉक्टर हमेशा ही कहते हैं कि ताज़े फल और हरी सब्ज़ियाँ हमारी सेहत के लिए बहु...

sathi shabdon ki: पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी की स्थिति: कुछ सुझाव

sathi shabdon ki: पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी की स्थिति: कुछ सुझाव: पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी की स्थिति: कुछ सुझाव अगर मुख्यधारा की पत्रकारिता की बात की जाए तो अंग्रेजी अखबारों का वर्चस्व अभी भी बरक़रार ...

sathi shabdon ki: सहज और सरल जैनी

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sathi shabdon ki: संस्कारों की ताक़त

sathi shabdon ki: संस्कारों की ताक़त: संस्कारों की ताक़त भारत एक विकासशील देश है। यहाँ पर अगर विदेशी कम्पनियाँ आकर पूँजी लगाकर कोई कारखाना लगाती हैं तो नि...

sathi shabdon ki: योग को धार्मिक चश्मे से न देखें

sathi shabdon ki: योग को धार्मिक चश्मे से न देखें: http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/47738566.cms

Tuesday, April 14, 2015

संस्कारों की ताक़त

संस्कारों की ताक़त
भारत एक विकासशील देश है। यहाँ पर अगर विदेशी कम्पनियाँ आकर पूँजी लगाकर कोई कारखाना लगाती हैं तो निश्चित रूप से भारत को मुनाफा होता है और साथ ही स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिलता है। मेरा भी यही सोचना था लेकिन इसके साथ कई मुश्किलें भी जुडी हुई है। जिनका अंदाज़ा मुझे कुछ दिन पहले हुआ।

कुछ दिन पहले मैं दिल्ली से जयपुर सड़क मार्ग से गयी।  दिल्ली जयपुर हाइवे पर स्थित नीमराणा में मैंने जापानी होटल और रेस्त्रां देखा। ये देखकर मुझे थोड़ी हैरानी हुई। मैंने वहां स्थित कई ढाबे भी देखे जिन पर बढ़िया शाकाहारी और मांसाहारी भोजन उपलब्ध था। ऐसे ही एक ढाबे पर हमने गाडी रोकी। ढाबे वाला नीमराणा का स्थानीय निवासी था। उसका घर वहीँ नीमराणा में स्थित एक गाँव में था। उत्सुकतावश जापानी होटल और रेस्त्रां के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यहाँ एक जापानी कंपनी का एयर कंडीशनर बनाने का कारखाना है  इसलिए यहाँ बड़ी संख्यां में जापानी रहते हैं। उनके लिए यहाँ हर तरह की सुख  सुविधाएँ मौजूद है। इस तरह यहाँ और भी कई विदेशी कंपनियां है जिनके कर्मचारियों के लिए अलग से होटल हैं और उनके यहाँ खायी जाने वाली डिसेज़ के रेस्त्रां है। यहाँ कोरियन और फ्रेंच कंपनिया कुछ ही समय में अपने पूरे लाव लश्कर के साथ रही है। मैंने उस ढाबे वाले से पूछा कि क्या इस तरह विदेशी कंपनियों का यहाँ भारत में आना यहाँ के लिए ठीक है? तो वो झट से बोला कि बहुत बढ़िया है जी इसकी वजह से पिछले कुछ सालों में यहाँ ज़मीन के दाम बेतहाशा बढे हैं। साथ ही स्थानीय लोगों को रोज़गार मिला है। अब उन्हें रोज़गार के लिए दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ता।  फिर, ये कंपनिया सैलरी भी अच्छी देती हैं।तो इससे लोगों के रहन सहन का स्तर भी ऊँचा हो रहा है। तो और क्या चाहिए ? मैंने कहा कि इस तरह यहाँ ढेर सारी  इंडस्ट्री लगाना क्या ठीक है? मेरी इस बात ने तो जैसे उसकी दुखती राग पर हाथ रख दिया।  कुछ देर चुप रहकर वो बोला कि यहाँ बहुत से ग्रामीणों ने अपनी भूमि बहुत महंगे दामों में बेच दी।  लोग बर्बाद भी हुए हैं। मैंने पूछा कि वो कैसे, तो उसने बताया कि यहाँ बहुत से ऐसे किसान थे जिन्हे अपनी भूमि बेचकर बहुत सा पैसा मिला। इतना पैसा अचानक मिल जाने से उन्हें समझ नहीं आया कि वो इस पैसे का सही इस्तेमाल कैसे करें। कई किसानों और उनके बच्चों ने काम करना बंद कर दिया और महँगी कार और अन्य भौतिक सुख सुविधाओं में ये रकम जमकर खर्च की।  हश्र ये हुआ कि कई किसान और उनके परिवारों के पास पैसा खत्म हो गया और अब उन्हें कोई छोटी मोटी नौकरी कर पड़ रही  है क्योंकि वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं और उन्हें किसानी के अलावा कुछ करना भी नहीं आता लेकिन किसानी के लिए ज़मीन अब उनके पास रही नहीं। अंत में उसने कहा। मैडम, सबसे ज़रूरी चीज़ है अच्छे संस्कार। अगर किसी माता पिता ने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए हैं तो  वो परिवार कभी बर्बाद नहीं हो सकता।    

सहज और सरल जैनी

सहज और सरल जैनी
जैन धर्म का इतिहास हिन्दू धर्म की तरह बहुत पुराना है। अहिंसा परमो धर्मः यानि हम लोग अहिंसा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते है। मन, वचन और काया: तीनो प्रकार से अहिंसा। यानि किसी को भी हानि पहुँचाना , यहां तक कि बुरा बोलने को भी हमारे धर्म में हिंसा करना माना जाता है। अमूमन जैनी लोग धनी माने जाते है।  कोई भी ऐतिहासिक जगह देखे तो वहां हमें जैन धर्म से सम्बंधित कुछ कुछ अवशेष मिल जायेंगे। अभी कुछ समय पहले मैं जैसलमेर गयी तो वहां पर सन 1805 में बनी पटुओं की हवेली देखी। यहाँ पांच जैन भाइयों की पांच सुन्दर हवेलियां हैं। इसमें से एक हवेली को म्यूजियम का रूप दे दिया गया है।  मैंने वहां देखा कि  उस समय के हिसाब से एक से एक नायाब चीज़ें वहां रखी थी।  यहाँ तक की कैमरा जैसे कुछ चीज़े तो विदेश से आयातित थी। जैन मंदिरों की भव्यता देखकर ये कहा जा सकता है कि जैन लोग प्राचीन काल से समृद्ध और कला प्रेमी लोगों में आते है। लेकिन साथ ही इस कौम में दान और त्याग की भावना ज़बरदस्त है। मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ आदि बनवाने में जैन लोग अग्रणी माने जाते है। 
हालाँकि जैन धर्म के लोगों का कठिन तप कई बार चर्चा का विषय बनता है।  परन्तु इस पंथ में कहीं भी किसी से ये ज़बरदस्ती नहीं की गयी कि वह कठिन तप करें।  मुख्य रूप से जैन धर्म के दो पंथ कहे जाते हैं, दिगंबर और शेताम्बर। श्वेताम्बर का अगर शाब्दिक अर्थ देखें तो श्वेताम्बर अर्थात वे जो सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं और दिगंबर अर्थात वे जिनके लिए धरती उनका बिछौना और आकाश ही ओढ़ना है। शेताम्बर और दिगंबर साधु इसी परिभाषा के अनुसार रहते हैं। 
जैन धर्म  में मुख्य रूप से अपनी इन्द्रियों को वश में करने  और सांसारिक मोह माया को त्यागने पर बल दिया गया है।
विकिपीडिया के अनुसार जैनियों की साक्षरता दर 94 .1% है  जबकि राष्ट्रीय औसत 65. 38 % है। इससे पता चलता है कि जैन लोग साक्षरता पर पूरा बल देते हैं। इसी के साथ जैन लोग अपनी बेटियों को भी साक्षर बनाने में पूरा यकीन रखते हैं इसलिए जैन लड़कियों की साक्षरता दर 90. 6 % जबकि राष्ट्रीय  दर  54.16% है। जैनियों के लिए कहा जाता है कि ये कौम मुख्यतः व्यापर में ही सलग्न होती है। लेकिन इसके साथ ही जैन युवा कई प्रतिष्ठित पदों पर काबिज़ हैं। फिर चाहे वह टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के विनीत जैन हो या डचेज़ बैंक के सीईओ अंशु जैन।
आम तौर पर कहा जाता है कि जैन लोग दिखावे में यकीन रखते हैं। और साथ ही ये लोग खाने को लेकर बहुत सेलेक्टिव होते हैं। कुछ हद तक ये बात सही है। परन्तु अब की जैन युवा पीढ़ी काफी लचीली है। उसे अपने संस्कारों और नए ज़माने के बीच बेलेंस बनाना गया है।

जैनियों में पहले भी दूसरी जाति में प्रेम विवाह होते रहे हैं लेकिन अब ये दर और भी ज्यादा बढ़ गयी है क्योंकि माता पिता अब अपने बच्चों की पसंद को ख़ुशी से स्वीकारने लगे हैं।