Tuesday, April 14, 2015

सहज और सरल जैनी

सहज और सरल जैनी
जैन धर्म का इतिहास हिन्दू धर्म की तरह बहुत पुराना है। अहिंसा परमो धर्मः यानि हम लोग अहिंसा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते है। मन, वचन और काया: तीनो प्रकार से अहिंसा। यानि किसी को भी हानि पहुँचाना , यहां तक कि बुरा बोलने को भी हमारे धर्म में हिंसा करना माना जाता है। अमूमन जैनी लोग धनी माने जाते है।  कोई भी ऐतिहासिक जगह देखे तो वहां हमें जैन धर्म से सम्बंधित कुछ कुछ अवशेष मिल जायेंगे। अभी कुछ समय पहले मैं जैसलमेर गयी तो वहां पर सन 1805 में बनी पटुओं की हवेली देखी। यहाँ पांच जैन भाइयों की पांच सुन्दर हवेलियां हैं। इसमें से एक हवेली को म्यूजियम का रूप दे दिया गया है।  मैंने वहां देखा कि  उस समय के हिसाब से एक से एक नायाब चीज़ें वहां रखी थी।  यहाँ तक की कैमरा जैसे कुछ चीज़े तो विदेश से आयातित थी। जैन मंदिरों की भव्यता देखकर ये कहा जा सकता है कि जैन लोग प्राचीन काल से समृद्ध और कला प्रेमी लोगों में आते है। लेकिन साथ ही इस कौम में दान और त्याग की भावना ज़बरदस्त है। मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ आदि बनवाने में जैन लोग अग्रणी माने जाते है। 
हालाँकि जैन धर्म के लोगों का कठिन तप कई बार चर्चा का विषय बनता है।  परन्तु इस पंथ में कहीं भी किसी से ये ज़बरदस्ती नहीं की गयी कि वह कठिन तप करें।  मुख्य रूप से जैन धर्म के दो पंथ कहे जाते हैं, दिगंबर और शेताम्बर। श्वेताम्बर का अगर शाब्दिक अर्थ देखें तो श्वेताम्बर अर्थात वे जो सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं और दिगंबर अर्थात वे जिनके लिए धरती उनका बिछौना और आकाश ही ओढ़ना है। शेताम्बर और दिगंबर साधु इसी परिभाषा के अनुसार रहते हैं। 
जैन धर्म  में मुख्य रूप से अपनी इन्द्रियों को वश में करने  और सांसारिक मोह माया को त्यागने पर बल दिया गया है।
विकिपीडिया के अनुसार जैनियों की साक्षरता दर 94 .1% है  जबकि राष्ट्रीय औसत 65. 38 % है। इससे पता चलता है कि जैन लोग साक्षरता पर पूरा बल देते हैं। इसी के साथ जैन लोग अपनी बेटियों को भी साक्षर बनाने में पूरा यकीन रखते हैं इसलिए जैन लड़कियों की साक्षरता दर 90. 6 % जबकि राष्ट्रीय  दर  54.16% है। जैनियों के लिए कहा जाता है कि ये कौम मुख्यतः व्यापर में ही सलग्न होती है। लेकिन इसके साथ ही जैन युवा कई प्रतिष्ठित पदों पर काबिज़ हैं। फिर चाहे वह टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के विनीत जैन हो या डचेज़ बैंक के सीईओ अंशु जैन।
आम तौर पर कहा जाता है कि जैन लोग दिखावे में यकीन रखते हैं। और साथ ही ये लोग खाने को लेकर बहुत सेलेक्टिव होते हैं। कुछ हद तक ये बात सही है। परन्तु अब की जैन युवा पीढ़ी काफी लचीली है। उसे अपने संस्कारों और नए ज़माने के बीच बेलेंस बनाना गया है।

जैनियों में पहले भी दूसरी जाति में प्रेम विवाह होते रहे हैं लेकिन अब ये दर और भी ज्यादा बढ़ गयी है क्योंकि माता पिता अब अपने बच्चों की पसंद को ख़ुशी से स्वीकारने लगे हैं।    

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