Monday, December 8, 2014

desh ke swadisht Phal

                           देश के स्वादिष्ट फल
डॉक्टर हमेशा ही कहते हैं कि ताज़े फल और हरी सब्ज़ियाँ हमारी सेहत के लिए बहुत अच्छी हैं। हमारा भी मन करता है कि हम अच्छी मात्रा  में ताज़े फल  खाएं । मुझे याद है कि बचपन में हमारे घर में हमेशा ही कोई न कोई फल फ्रिज में रखा होता था लेकिन आज देखें तो फलों की भरी रेहड़ियां तो जैसे कहीं खो सी गयी हैं और जो है भी तो उनमे ठीक ठाक क्वालिटी के ज्यादातर फलों का भाव 100 रूपये किलो या उससे ऊपर है तो ऐसे में कोई किस तरह रोज़ खुद फल खाए या अपने परिवार वालो को खाने को दे। बचपन में जब माँ के साथ किसी रिश्तेदार के घर जाते थे तो माँ भेंट स्वरुप दो दर्जन केले ले जाती थी। आज ठीक ठाक से दो दर्जन केले भी 120 रूपये के आते है।
कुछ दिन पहले मेरा भाई दफ्तर के काम से एक महीने के लिएयू के’ के बर्मिंघम शहर गया। वहाँ से आकर उसने मुझे बताया कि वहां बहुत ही ताज़े और बढ़िया क्वालिटी के फल मिलते है। उसने मुझे हरे रंग के बड़े बड़े सेब भी दिखाए जो वहां हमारी मुद्रा में लगभग 100 रूपये में 6 जाते है। वो लगातार उन फलों की तारीफ़ कर रहा था। उसका कहना था कि इन फलों को आप चाहे एक सप्ताह यूँही रख दो पर ये ख़राब नहीं होते जबकि भारत में तो फल तीन दिन में ही ख़राब हो जाते है।  इसका कारण ये है कि बर्मिंघम में फल प्राकर्तिक रूप से पकाये जाते है। जबकि भारत में ज्यादातर फल कच्चे ही डाल पर से तोड़ लिए जाते हैं और फिर उन्हें मसाले से पकाया जाता है। उसे वहां ये भी पता चला कि बर्मिंघम में अल्फांसो आम बैन है क्योंकि वह मसाले से पकता है।
ऐसा ही एक किस्सा मुझे भी याद आता है।  चार साल पहले मैं हिमाचल प्रदेश घूमने गयी थी। रास्ते में सेबों  का एक बाग़ देखकर हमने अपनी गाडी वहीँ  रोक ली। अंदर जाकर देखा तो उस बाग़ में खूब सारे सेब और बब्बूगोशो से लदे हुए पेड़ थे और कुछ हिमाचली स्त्रियां अपनी कमर पर टोकरी बांधे उन फलों को पेड़ से तोड़ रही थी। कोई जान पहचान ना होते हुए भी उन्होंने हमारा बड़े स्नेह से स्वागत किया। फिर उन्होंने अपने आप ही धो पोंछ कर हमे कुछ  बब्बूगोशे खाने को दिए।  हालाँकि हम तभी लंच करके ही आये थे लेकिन फिर भी वो बड़े बड़े और सुन्दर बब्बूगोशे इतने स्वादिष्ट थे कि हमने भरे पेट पर भी वो बब्बूगोशे खा लिए।  मैंने उन हिमाचली स्त्रियों से पूछा कि दिल्ली में तो मैंने इतने बड़े और स्वादिष्ट बब्बूगोशे कभी नहीं देखे तो वह बोली कि ये फल तो सिर्फ विदेशों में  निर्यात होते है। 
माना कि निर्यात से हमे विदेशी मुद्रा की आमदनी होती है लेकिन ये भी तो सही नहीं कि हमें तो अपने देश के स्वादिष्ट फल खाने को मिले या मिले भी तो उनकी कीमत इतनी ऊँची हो कि हमारी पहुँच से बाहर हो जाएँ पर विदेशी हमारे फल खाए भी और फिर हमी पर गरियाये भी

No comments:

Post a Comment