Tuesday, December 9, 2014

पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी की स्थिति: कुछ सुझाव

पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी की स्थिति: कुछ सुझाव
अगर मुख्यधारा की पत्रकारिता की बात की जाए तो अंग्रेजी अखबारों का वर्चस्व अभी भी बरक़रार है। ऐसा माना जाता है कि  बुद्धिजीवी वर्ग सिर्फ अंग्रेजी अख़बार ही पढता है। इसी तरह अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि  अंग्रेजी मीडिया की तुलना में हिंदी मीडिया कर्मियों को कम वेतन दिया जाता है। मैंने खुद इस बात को महसूस किया है कि अगर मैं हिंदी में कोई आलेख लिखती हूँ तो मुझे कुछ सौ रुपयों में भुगतान किया जाता है वहीँ अगर मैं अंग्रेजी में लिखूं तो यही भुगतान हज़ार रूपये से ऊपर जाता है। क्यों मुख्यधारा के मीडिया में हिंदी को अंग्रेजी से कमतर आँका जाता है जबकि हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। यही हाल कमोबेश पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी का है। यहाँ भी हिंदी पत्रकारिता की पढाई को अंग्रेजी के मुकाबले दोयम दर्जे का माना जाता रहा है। पत्रकारिता में अंग्रेजी की जहां ढेर सारी किताबें उपलब्ध हैं वहीँ हिंदी में कुछ गिनी चुनी किताबें ही उपलब्ध हैं। उसमे भी ज्यादातर अंग्रेजी से ही अनुवादित किताबें है। इसका एक उदाहरण स्नातक वर्ग के हिंदी पत्रकारिता के सलेबस के रूप में देखा जा सकता है  जहां रेफरेंस बुक्स में भी ज्यादातर  अंग्रेजी किताबों का ही ज़िक्र है। अगर हिंदी पत्रकारिता के छात्रों पर एक सरसरी दृष्टि डाली जाये तो हम पाते है कि ज्यादातर छात्र पिछड़े वर्गों से आते है जबकि अंग्रेजी पत्रकारिता के छात्र संपन्न परिवारों से आते है। प्राइवेट कॉलेजों में तो ऊँची फ़ीस लेकर ज्यादातर अंग्रेजी पत्रकारिता ही पढाई जा रही है। ज्यादातर प्राइवेट कॉलेज मीडिया लैब से सुसज्जित हैं जबकि हिंदी पत्रकारिता पढ़ने वाले सरकारी महाविद्यालयों में मीडिया लैब की घोर कमी है जिस कारण छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान नहीं मिल पाता। जिसका खामियाजा उन्हें आगे चलकर भुगतना पड़ता है। साथ ही उनमे ये भावना भी आती है कि चूँकि हम हिंदी पत्रकारिता के छात्र है इसलिए हमसे ये भेदभाव किया जा रहा है।
अतः इस समबन्ध में मेरे कुछ सुझाव है जिन पर अमल करते हुए हम हिंदी पत्रकारिता के छात्रों का भविष्य उज्जल्वल बना सकते है. 
१. हिंदी पत्रकारिता की ज्यादा से ज्यादा किताबें प्रकाशित की जाएँ और उन्हें छात्रों के लिए सहज उपलब्ध करवाया जाये।
२. किताबो की भाषा सरल हो।
३. कोर्स निरंतर अपडेट हो।
४. छात्रों को विषय की पढाई के साथ साथ व्यक्तित्व विकास और सम्प्रेषण कला की कुछ कक्षाएं लगायी जाए।
५. पढाई के साथ साथ छात्रों को व्यवाहरिक ज्ञान के लिए नियमित रूप से मीडिया हाउस ले जाया जाये।
६ . कॉलेज में अपना मीडिया लैब हो जिसमें निपुण लोग हो.
७. छात्रों को निरंतर प्रोत्साहित करने के लिए सप्ताह में एक बार उनके बीच पाठ्यक्रम सम्बन्धी कोई भी अतिरिक्त कार्यकलाप जैसे प्रश्नोत्तरी, इत्यादि कार्यक्रम रखे जाएँ।
८ . समय समय पर मुख्यधारा मीडिया से एक्सपर्ट बुलाये जाएँ जो इंडस्ट्री में हो रहे नित नए बदलावों से छात्रों को परिचित करवा सकें।
९ . इसी तरह शिक्षकों की भी ट्रेनिंग हो जिससे वो भी इंडस्ट्री के बदलावों के अनुसार अपने लेक्चर तैयार कर सकें।

और अंतिम बात, छात्रों के मन से हमें इस भ्रान्ति को निकल फेंकना होगा कि पत्रकारिता और उस पर हिंदी पत्रकारिता पढने वाले  छात्रों का भविष्य खतरे में हैं

Monday, December 8, 2014

desh ke swadisht Phal

                           देश के स्वादिष्ट फल
डॉक्टर हमेशा ही कहते हैं कि ताज़े फल और हरी सब्ज़ियाँ हमारी सेहत के लिए बहुत अच्छी हैं। हमारा भी मन करता है कि हम अच्छी मात्रा  में ताज़े फल  खाएं । मुझे याद है कि बचपन में हमारे घर में हमेशा ही कोई न कोई फल फ्रिज में रखा होता था लेकिन आज देखें तो फलों की भरी रेहड़ियां तो जैसे कहीं खो सी गयी हैं और जो है भी तो उनमे ठीक ठाक क्वालिटी के ज्यादातर फलों का भाव 100 रूपये किलो या उससे ऊपर है तो ऐसे में कोई किस तरह रोज़ खुद फल खाए या अपने परिवार वालो को खाने को दे। बचपन में जब माँ के साथ किसी रिश्तेदार के घर जाते थे तो माँ भेंट स्वरुप दो दर्जन केले ले जाती थी। आज ठीक ठाक से दो दर्जन केले भी 120 रूपये के आते है।
कुछ दिन पहले मेरा भाई दफ्तर के काम से एक महीने के लिएयू के’ के बर्मिंघम शहर गया। वहाँ से आकर उसने मुझे बताया कि वहां बहुत ही ताज़े और बढ़िया क्वालिटी के फल मिलते है। उसने मुझे हरे रंग के बड़े बड़े सेब भी दिखाए जो वहां हमारी मुद्रा में लगभग 100 रूपये में 6 जाते है। वो लगातार उन फलों की तारीफ़ कर रहा था। उसका कहना था कि इन फलों को आप चाहे एक सप्ताह यूँही रख दो पर ये ख़राब नहीं होते जबकि भारत में तो फल तीन दिन में ही ख़राब हो जाते है।  इसका कारण ये है कि बर्मिंघम में फल प्राकर्तिक रूप से पकाये जाते है। जबकि भारत में ज्यादातर फल कच्चे ही डाल पर से तोड़ लिए जाते हैं और फिर उन्हें मसाले से पकाया जाता है। उसे वहां ये भी पता चला कि बर्मिंघम में अल्फांसो आम बैन है क्योंकि वह मसाले से पकता है।
ऐसा ही एक किस्सा मुझे भी याद आता है।  चार साल पहले मैं हिमाचल प्रदेश घूमने गयी थी। रास्ते में सेबों  का एक बाग़ देखकर हमने अपनी गाडी वहीँ  रोक ली। अंदर जाकर देखा तो उस बाग़ में खूब सारे सेब और बब्बूगोशो से लदे हुए पेड़ थे और कुछ हिमाचली स्त्रियां अपनी कमर पर टोकरी बांधे उन फलों को पेड़ से तोड़ रही थी। कोई जान पहचान ना होते हुए भी उन्होंने हमारा बड़े स्नेह से स्वागत किया। फिर उन्होंने अपने आप ही धो पोंछ कर हमे कुछ  बब्बूगोशे खाने को दिए।  हालाँकि हम तभी लंच करके ही आये थे लेकिन फिर भी वो बड़े बड़े और सुन्दर बब्बूगोशे इतने स्वादिष्ट थे कि हमने भरे पेट पर भी वो बब्बूगोशे खा लिए।  मैंने उन हिमाचली स्त्रियों से पूछा कि दिल्ली में तो मैंने इतने बड़े और स्वादिष्ट बब्बूगोशे कभी नहीं देखे तो वह बोली कि ये फल तो सिर्फ विदेशों में  निर्यात होते है। 
माना कि निर्यात से हमे विदेशी मुद्रा की आमदनी होती है लेकिन ये भी तो सही नहीं कि हमें तो अपने देश के स्वादिष्ट फल खाने को मिले या मिले भी तो उनकी कीमत इतनी ऊँची हो कि हमारी पहुँच से बाहर हो जाएँ पर विदेशी हमारे फल खाए भी और फिर हमी पर गरियाये भी