पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी की स्थिति: कुछ सुझाव
अगर मुख्यधारा
की पत्रकारिता की बात की जाए तो अंग्रेजी अखबारों का वर्चस्व अभी भी बरक़रार है। ऐसा
माना जाता है कि बुद्धिजीवी वर्ग सिर्फ अंग्रेजी
अख़बार ही पढता है। इसी तरह अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि अंग्रेजी मीडिया की तुलना में हिंदी मीडिया कर्मियों
को कम वेतन दिया जाता है। मैंने खुद इस बात को महसूस किया है कि अगर मैं हिंदी में
कोई आलेख लिखती हूँ तो मुझे कुछ सौ रुपयों में भुगतान किया जाता है वहीँ अगर मैं अंग्रेजी
में लिखूं तो यही भुगतान हज़ार रूपये से ऊपर जाता है। क्यों मुख्यधारा के मीडिया में
हिंदी को अंग्रेजी से कमतर आँका जाता है जबकि हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। यही हाल
कमोबेश पत्रकारिता शिक्षा में हिंदी का है। यहाँ भी हिंदी पत्रकारिता की पढाई को अंग्रेजी
के मुकाबले दोयम दर्जे का माना जाता रहा है। पत्रकारिता में अंग्रेजी की जहां ढेर सारी
किताबें उपलब्ध हैं वहीँ हिंदी में कुछ गिनी चुनी किताबें ही उपलब्ध हैं। उसमे भी ज्यादातर
अंग्रेजी से ही अनुवादित किताबें है। इसका एक उदाहरण स्नातक वर्ग के हिंदी पत्रकारिता
के सलेबस के रूप में देखा जा सकता है जहां
रेफरेंस बुक्स में भी ज्यादातर अंग्रेजी किताबों
का ही ज़िक्र है। अगर हिंदी पत्रकारिता के छात्रों पर एक सरसरी दृष्टि डाली जाये तो
हम पाते है कि ज्यादातर छात्र पिछड़े वर्गों से आते है जबकि अंग्रेजी पत्रकारिता के
छात्र संपन्न परिवारों से आते है। प्राइवेट कॉलेजों में तो ऊँची फ़ीस लेकर ज्यादातर
अंग्रेजी पत्रकारिता ही पढाई जा रही है। ज्यादातर प्राइवेट कॉलेज मीडिया लैब से सुसज्जित
हैं जबकि हिंदी पत्रकारिता पढ़ने वाले सरकारी महाविद्यालयों में मीडिया लैब की घोर कमी
है जिस कारण छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान नहीं मिल पाता। जिसका खामियाजा उन्हें आगे
चलकर भुगतना पड़ता है। साथ ही उनमे ये भावना भी आती है कि चूँकि हम हिंदी पत्रकारिता
के छात्र है इसलिए हमसे ये भेदभाव किया जा रहा है।
अतः इस
समबन्ध में मेरे कुछ सुझाव है जिन पर अमल करते हुए हम हिंदी पत्रकारिता के छात्रों
का भविष्य उज्जल्वल बना सकते है.
१. हिंदी
पत्रकारिता की ज्यादा से ज्यादा किताबें प्रकाशित की जाएँ और उन्हें छात्रों के लिए
सहज उपलब्ध करवाया जाये।
२. किताबो
की भाषा सरल हो।
३. कोर्स
निरंतर अपडेट हो।
४. छात्रों
को विषय की पढाई के साथ साथ व्यक्तित्व विकास और सम्प्रेषण कला की कुछ कक्षाएं लगायी
जाए।
५. पढाई
के साथ साथ छात्रों को व्यवाहरिक ज्ञान के लिए नियमित रूप से मीडिया हाउस ले जाया जाये।
६ . कॉलेज
में अपना मीडिया लैब हो जिसमें निपुण लोग हो.
७. छात्रों
को निरंतर प्रोत्साहित करने के लिए सप्ताह में एक बार उनके बीच पाठ्यक्रम सम्बन्धी
कोई भी अतिरिक्त कार्यकलाप जैसे प्रश्नोत्तरी, इत्यादि कार्यक्रम रखे जाएँ।
८ . समय
समय पर मुख्यधारा मीडिया से एक्सपर्ट बुलाये जाएँ जो इंडस्ट्री में हो रहे नित नए बदलावों
से छात्रों को परिचित करवा सकें।
९ . इसी
तरह शिक्षकों की भी ट्रेनिंग हो जिससे वो भी इंडस्ट्री के बदलावों के अनुसार अपने लेक्चर
तैयार कर सकें।
और अंतिम बात, छात्रों के मन से हमें इस भ्रान्ति को निकल फेंकना होगा कि पत्रकारिता और उस पर हिंदी पत्रकारिता पढने वाले छात्रों का भविष्य खतरे में हैं ।