क्या वाकई इन्टरनेट बच्चों को बिगाड़ रहा है?
पीटीआई की एक खबर के मुताबिक यूगोव द्वारा कराई गयी एक नई स्टडी में ये बातसामने आई है कि ब्रिटेन में आठ से पंद्रह साल के करीब बारह लाख बच्चे अपने मोबाइल फोन पर हिंसक और अश्लील सामग्री देखते है. इसमें ज्यादातर बच्चों ने ये भी कहा कि उन्हें ये मोबाइल फ़ोन उनके माता पिता ने दिए है. आज जब ज्यादातर बच्चो के पास मोबाइल है और साथ साथ इन्टरनेट की सुविधा भी है तो बच्चो पर की गयी स्टडी में इस तरह के नतीजे सामने आना कोई बड़ी बात नहीं है. बेशक ये आंकड़े ब्रिटेन के है लेकिन इस स्टडी के नतीजो को देखते हुए हमें भी संभलने की ज़रूरत है. संचार क्रांति के बाद हर हाथ में मोबाइल का सपना पूरा सा होता नज़र आ रहा है. फिर चाहे वह हाथ छोटे बच्चों के ही क्यों न हो. मोबाइल के गिरते दामों और सस्ती कॉल दरों ने हम सबको एक दूसरे के बेहद नजदीक लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. आज चाहे अमीर हो
या गरीब,युवा हो या बुज़ुर्ग, रोटी, कपडा और मकान के बाद मोबाइल सबकी अहम्
ज़रूरत बन गया है. लेकिन खिलौनों से खेलने वाले बच्चों के पास मोबाइल होना और फिर बच्चों द्वारा उसका गलत इस्तेमाल करना एक बहुत बड़ी समस्या है जिससे हमारे देश की आने वाली पीढ़ी युवा होने से पहले ही युवा हो रही है.
देखा जाये तो इसके लिए हम खुद भी ज़िम्मेदार हैं.जब बच्चा बहुत छोटा होता है और रोता है तो हम उसे मोबाइल की
रिंगटोन सुनाकर या मोबाइल पर गाने सुनाकर बहला देते है. वो थोडा और बड़ा होता है
और चलना सीखता है तो हम उसके हाथ में मोबाईल फ़ोन पकड़ा देते है. देखा जाये तो मोबाइल फोन के प्रति उसका आकर्षण यही से शुरू हो जाता है. उसे लगता है कि ये एक ऐसा खिलौना है जिसमें संगीत बजता है और अलग अलग तरह की आवाज़े आती है. जब वह थोडा और बड़ा होता है तो अक्सर माता या पिता को फ़ोन पर बात करते देखता है तो उसमें
इसे देखने और समझने की इच्छा जागृत होती है. जब वह इसे अच्छी तरह जान और समझ जाता है तो उसे भी लगने लगता है कि ये तो बहुत काम की चीज़ है. इससे बात कर सकते है, संगीत सुन सकते है, तरह तरह के गेम्स खेल सकते है, तस्वीरे खींच सकते है.यही कारण है कि आज एक पांच साल का बच्चा भी अपने जन्मदिन पर अपने माता पिता से तोहफे के रूप में मोबाइल फोन मांगता है.
अब माता पिता (खासकर शहरी माता पिता) भी इतने संपन्न है कि बच्चे को मोबाइल फोन दिलवाने से गुरेज़ नहीं करते.बच्चों में मोबाइल फोन के सेट को लेकर भी अजब दीवानगी होती है.दोस्तों के बीच अपना प्रभाव ज़माने के लिए महंगा मोबाइल फोन सेट बड़ा काम आता है.
आजकल बाज़ार में स्मार्ट फोन्स की भरमार है. लगभग हर ठीकठाक फोन में इन्टरनेट की सुविधा है. हम सभी जानते है कि इन्टरनेट बहुत काम की चीज़ है. इसके बिना शायद अब काम चलना मुश्किल है. इसी कारण अब बच्चों को भी छुटपन से कम्प्यूटर चलाने की शिक्षा दी जा रही है. अब बच्चे खूब अच्छी तरह से इन्टरनेट चलाना जानते है. लेकिन जैसे की हर नयी तकनीक के फायदे और नुकसान दोनों ही होते है उसी तरह इन्टरनेट के भी है. इन्टरनेट पर अच्छी जानकारी के साथ साथ ऐसा भी बहुत कुछ मौजूद है जो बच्चों को कतई देखना नहीं चाहिए. साइबर केफे या घर के कंप्यूटर पर अगर बच्चे इस तरह का कंटेंट देखते है तो इस पर फिर भी नज़र रखी जा सकती है लेकिन मोबाइल फ़ोन जो की एक निहायत ही पर्सनल और छोटा सा गेजेट है, इसका इस्तेमाल बेहद आसानी से और कहीं भी किया जा सकता है.
इन्टरनेट पर मौजूद अश्लील सामग्री बच्चों के अबोध मन पर अश्लील किताबो से मिले अधकचरे ज्ञान से भी ज्यादा घातक असर डालती है क्योंकि इन्टरनेट के माध्यम से वह सब कुछ प्रत्यक्ष देख पाता है जबकि किताबों में शब्दों को पढ़कर वह अपने मस्तिष्क में उसकी छवि बना लेता है. इसी तरह इन्टरनेट पर देखे गए अति हिंसक दृश्य बाल मन पर बहुत बुरा असर डालते हैं.
अब सवाल यह उठता है कि इस तरह की सामग्री देखने से बच्चों को रोका कैसे जाये.
इसका एक उपाय यह है कि इन्टरनेट से इस तरह की सारी सामग्री हटा दी जाये जोकि थोडा मुश्किल कार्य है. तो इसका एक और बहुत ही सरल सा उपाय है और वो यह है कि बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच इस विषय पर खुल कर संवाद हो. मानव मन शुरू से ही जिज्ञासु प्रवृति का होता है. यह तब तक उस चीज़ को खोजता रहता है जब तक उस चीज़ को लेकर उसकी जिज्ञासा पूरी नहीं हो जाती. बच्चों के साथ भी बिलकुल ऐसा ही है. वे भी हर नयी चीज़ के विषय में जानना चाहते हैं और उनकी हर जिज्ञासा का सही तरीके से निवारण करना ज़रूरी होता है. इसके लिए आवश्यक है कि माता पिता और बच्चों के बीच ऐसे सम्बन्ध का विकास हो जिसमे बच्चा अपनी बात खुल कर और बिना किसी डर के कह सके. इसके लिए माता पिता को खुद बच्चों के आगे उदहारण प्रस्तुत करना होगा. वे खुद भी बच्चों से कुछ न छुपाये और उन्हें भी कोई भी बात न छुपाने के लिए प्रेरित करें. इसके साथ साथ अगर बच्चों को शुरू से ही सही गलत का भेद करना सिखा दिया जाये तो ये समस्या काफी हद तक कम
हो सकती है. साथ ही बच्चे को मोबाइल दिलवाते समय माता पिता ये ज़रूर सोचे की क्या वाकई बच्चे को अभी इसकी ज़रूरत है? स्कूल भी इस विषय पर कार्यशालाए आयोजित करवा कर छात्रों को जागरूक कर सकते हैं.
इंसान नयी तकनीके अपनी सुविधा के लिए इजाद करता है. लेकिन उसका सही और भरपूर फायदा हमे कैसे उठाना है ये हम पर निर्भर करता है. इसलिए बच्चों के लिए अश्लील और हिंसक सामग्री उपलब्ध करवाने के लिए इन्टरनेट को दोष देने की बजाए अगर हम अपने बच्चों को इन्टरनेट का सही इस्तेमाल करने की सलाह दे तो इस तरह की परेशानी से काफी हद तक बचा जा सकता है.
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