Saturday, May 31, 2014

singapore diary-part 3

सिंगापुर डायरी- पार्ट 3

सिंगापोर में दो ही तरह का मौसम होता है. या तो गर्मी या फिर बारिश।  उन दिनों भी वहां का तापमान लगभग 34 -35 डिग्री के आसपास चल रहा था। वहां भी भारत की तरह होटल का चेक इन टाइम दोपहर दो बजे का था जबकि हम वहां लगभग 11. 30 बजे ही पहुँच गए। होटल की लॉबी में देखा तो कुछ भारतीय और विदेशी कमरे के इंतज़ार में सोफों पर पसरे पड़े थे।  आशा के अनुरूप हमें भी कमरे के लिए इंतज़ार करने को कहा गया। अब क्या करे? तो रिसेप्शन से सुझाव मिला कि पास ही में लिटल इंडिया है, वहां घूम आइए। हमारे पास कोई और ऑप्शन भी तो नहीं था। लिटल इंडिया वाकई में पास ही था। भूख लगी थी तो सोचा कि कुछ खा लिया जाए। थोड़ी ही दूरी पर एक कुछ भारतीय रेस्त्रां नज़र आये। एक शाकाहारी रेस्त्रां में मेन्यू पूछा तो बोला जी 'कीमा' मिलता है। मैंने हैरान होकर पूछा तो रेस्त्रां मालिक हँसते हुए बोला कि ये शाकाहारी कीमा है। पर उस सब्ज़ी की शक्ल ही अच्छी नहीं थी तो मैं आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूरी पर 'आनंद भवन' नाम का शाकाहारी दक्षिण भारतीय रेस्त्रां मिला। मन को सुकून मिला कि चलो खाने के लिए ज्यादा भटकना नहीं पड़ा। रेस्त्रां में सेल्फ सर्विस थी। मेरे पति ने आदतन मेरे लिए आर्डर दिया कि 'एक' मसाला डोसा। मैंने फ़ौरन उन्हें टोका कि ये विदेश है, यहाँ एक मसाला डोसा नहीं, 'वन' मसाला डोसा कहिये। वो बहुत ही साधारण सा नॉन एसी रेस्त्रां था फिर भी हम चार लोगों का खाने का बिल हज़ार रूपये था। कारण; वहां की मुद्रा महँगी थी। एक सिंगापोर डॉलर लगभग 50 रूपये के बराबर था। खाना खा कर बाहर निकले। थोड़ा आगे बढे तो देखा लिटल इंडिया वाकई में लिटल इंडिया ही था। वहां पंजाबी सूट से लेकर दक्षिण भारतीय साड़ियाँ मिल रही थी। किसी दुकान पर दक्षिण भारतीय संगीत बज रहा था को एक पंजाबी रेस्त्रां में तो यो यो हनी सिंह भी सुनाई दे रहा था। एक बात वहां बड़ी दिलचस्प थी। वहां ढेर सारी ज़ेवरों की दुकाने थी। मुझे लगा कि इस तरह ज़ेवर खुले में रखे है तो नकली ज़ेवर ही होंगे। पर बड़े खूबसूरत ज़ेवर थे बिलकुल असली ज़ेवरों जैसे। उत्सुकतावश वहां एक दुकानदार से एक छोटी सी नाक की लॉन्ग का रेट पूछा तो उन्होंने सोने के भाव से कैलकुलेट करके लगभग 240 डॉलर यानी 12000 रूपये बताया। तब पता चला कि ये सब असली हीरे और सोने के ज़ेवर थे। वहां भी भारत की तरह पटरी बाजार लगा था जिसमे खूब भीड़ भी थी लेकिन मज़ाल है कि कही कोई जाम लग जाए या  भीड़ में किसी की जेब कट जाए या फिर महिलाओं के साथ किसी तरह की बदतमीज़ी हो जाये। वहां ज्यादातर लडकियां शॉर्ट्स और कट स्लीव्स की और खुले गले की टी शर्ट्स में थी जबकि स्त्रियों ने ज्यादातर वन पीस मिड्डी पहनी हुई थी। लड़के भी हाफ पेंट और टी शर्ट में थे। वहां माहौल बहुत खुला था। किसी की आँखों में किसी महिला के लिए कोई वाहियात या गलत ख्याल नहीं था। एक बात और थी, वहां कोई भी बच्चा माता पिता की गोदी में नहीं था। सभी गोदी के बच्चे अपनी प्रैम में थे। एक और बात नोटिस करने लायक थी। वहां लोग साइकिल बड़े आराम से चला रहे थे और जो लोग महँगी गाड़ियां चला रहे थे उनमे भी कही अपनी गाडी का दिखावा नहीं था।  ऐसा लगता था मानो कि वहां के लोग बहुत ही पर्यावरण प्रेमी थे। सबके पास महंगी कारों के साथ साथ साइकिल भी थी और कार का इस्तेमाल वे अपनी ज़रूरत के लिए ही करते थे नाकि दिखावे के लिए। रास्ते भर इसी तरह की अनोखी चीज़े देखते देखते हम अपने होटल वापिस आ गए।                     

hum hi banate hai desh ki chavi.

Friday, May 30, 2014

singapore diary- part 2

सिंगापुर डायरी- पार्ट 2
विमान से बाहर निकलते हुए सिंगापोर एयरलाइन्स की विमान परिचारिकाओं ने बड़ी गर्मजोशी से बाय कहा। मुझे उनकी पहनी हुई यूनिफार्म बड़ी पसंद आई। ये  नीले रंग की प्रिंटेड लॉन्ग स्कर्ट और लॉन्ग ब्लाउज था जिसे सिंगापुर में कुरुंग कहते है। विमान से उतरकर कैरेज वे से आते हुए अन्य विमान नज़र आ रहे थे जिसमे ज्यादातर सिंगापोर एयरलाइन्स के ही विमान थे। देखने से ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी छोटे शहर का एयरपोर्ट हो। हम टर्मिनल 2 पर उतरे थे। 
सिंगापुर का चांगी एयरपोर्ट काफी खाली खाली था। बाहर सड़क पर देखने पर ऐसा लगता था कि जैसे मैं मुंबई में हूँ। एयरपोर्ट पर तरह तरह के ईटिंग जॉइंट्स थे जिसमे ज्यादातर में चाइनीज़ खाना ही मिल रहा था। साथ ही मनी चेंजर और लोकल सिम खरीदने के लिए भी कियोस्क थे। हमारा ड्राइवर हमें लेने के बाद एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 पर गया जहाँ से उसे एक और पैसेंजर को लेना था। तब मुझे अंदाज़ा हुआ कि चांगी एयरपोर्ट कितना बड़ा था। सिंगापोर टेक्नोलॉजी के मामले में काफी उन्नत है, ये बात मुझे पहले ही पता थी लेकिन अब एक एक करके मेरे सामने हैरान कर देने वाली टेक्नोलॉजी आने लगी थी। एयरपोर्ट से होटल जाते हुए चौड़ी और साफ़ सड़के, उस पर अपनी लेन में स्मूथली चलता ट्रैफिक और दुनिया की बेहतरीन गाड़ियां। कुछ गाड़ियां तो ऐसी थी जो अभी भारत में लॉन्च ही नहीं हुई हैं, और वहां वो टैक्सी के रूप में चल रही थीं। मैं खुद मर्सिडीज में बैठी थी। मिड लेवल गाड़ियां जैसे सैंट्रो ज़िंग, आल्टो, वैगन आर, आई टेन का तो वहां नामो निशान नहीं था। वहां ज्यादातर ऐसी गाड़ियां थीं जो बहुत कम माइलेज देती है जबकि वहां भी पेट्रोल का दाम भारत से कोई कम नहीं था। वहां मैंने आई 40, क्रिसलर, किआ जैसी गाड़ियां टैक्सी के रूप में देखी जिनका भारत में कोई शोरूम ही नहीं है। एयरपोर्ट से होटल तक की लगभग 25 मिनट की यात्रा में मुझे कहीं भी एक भी ट्रैफिक पुलिस कर्मी नज़र नहीं आया। मैंने जब ड्राइवर से इस बारे में पूछा तो उसने बताया कि यहाँ सब जगह कैमरे लगे हैं फिर ट्रैफिक पुलिस कर्मी का क्या काम?  लेकिन अगर दुर्भाग्य से कोई हादसा हो जाता है तो पुलिस सिर्फ दो मिनट में हादसे की जगह पहुँच जाती है। सड़क पर जगह जगह हरे और नीले रंग के बिलकुल वैसे ही साइन बोर्ड लगे थे जैसे भारत की सड़कों पर लगे होते हैं। उन्हें देख कर समझ आया कि भारत में विदेशी टेक्नोलॉजी यूँ की यूँ चिपका दी जाती है।

मर्सिडीज़ वैन में हमारे साथ एक अन्य मुसाफिर भी थी जो फिलीपींस से बिज़नेस ट्रिप पर आई थी।उसके भाई भाभी दो घंटे पहले ही सिंगापोर पहुँच चुके थे। वो दूसरी बार सिंगापोर आ रही थी। जब उसने मुझसे मेरे बारे में पूछा तो मैंने इंडिया कहा। पहली बार ऐसा हुआ था कि मैंने अपने देश का नाम लिया था।  इससे पहले तो भारत में कहीं भी जाते थे तो सिर्फ दिल्ली कहने भर से काम चल जाता था।  सच कहूँ तो उस समय मुझे सही मायनों में भारतीय होने का और अपने विदेश में होने का अहसास हुआ। वहां के लोगों से बात करने के लिए अंग्रेजी जानना बहुत ज़रूरी था। उस पर उनका अंग्रेजी डाइलेक्ट बिलकुल अलग था।  हम भारतीय बिलकुल अलग तरह की अंग्रेजी बोलते है। उनका डाइलेक्ट पकड़ने में मुझे भी कुछ वक़्त लगा। मसलन उनकी ज़ुबान पर 'ट ' और 'ड' अक्षर है ही नहीं।  वो total को 'तोतल' कहेंगे और हमारे यहाँ तो 'तोतल' का मतलब ही कुछ और ही हो जाता है।  इसी तरह वो लोग madam को 'मदाम' कहते है और studied को 'स्तादिद' इसलिए मैंने भी एक फार्मूला अपनाया। बातचीत में जहाँ भी वो 'त' और 'द' लगाते वहां मैं मन ही मन 'ट' और 'ड' लगा लेती और आराम से उनकी बात का मतलब समझ जाती।        

Sunday, May 25, 2014

सिंगापुर डायरी (part 1)


जब भी कभी किसी को विदेश यात्रा पर जाते देखती तो मन में ये कभी नहीं आता था कि मैं भी कभी भारत से बाहर जाउंगी। लेकिन अचानक ही मुझे भी परिवार सहित भारत से बाहर जाने का मौका मिला। ये मेरी पहली विदेश यात्रा थी इसलिए मेरे मन के भीतर बैठा छोटा बच्चा बल्लियों उछल रहा था। कहीं मन में उत्सुकता मिला थोड़ा डर भी था। आखिरकार 10 मई का वो दिन भी गया जिस दिन मझे अपने देश से बाहर जाने के लिए उड़ान भरनी थी।हम एक्साइटमेंट में उड़ान के समय से साढ़े तीन घंटे पहले ही एयरपोर्ट पहुँच गए गए। दिल्ली का इंदिरा गांधी टर्मिनल 3 मेरी सोच से भी ज्यादा खूबसूरत था। अचानक याद आया फेसबुक पर किसी ने बताया था कि इस जगह कभी गाँव हुआ करते थे। एयरपोर्ट पर खूब सारे विदेशी देखकर ख्याल आया कि ये विदेशी जब एयरपोर्ट पर उतरते होंगे तो सब कुछ खूबसूरत और चकाचक देखते होंगे और फिर पहाड़ गंज या करोल बाग़ के होटल में ठहर कर दिल्ली में गन्दगी और जाम देखते होंगे। लोगों के चेहरे ओब्सर्व करने में मुझे बड़ा मज़ा रहा था। कोई थका हुआ था तो कोई जल्दी में था। किसी के माथे पर तिलक लगा था तो कोई सिर्फ एक शोल्डर बैग कंधे पर टाँगे ऊंघ रहा था. खूब सारी ड्यूटी फ्री दुकानों पर तरह तरह का भारतीय सामान सजा था। इन्ही सब चीज़ो को देखते हुए साढ़े तीन घंटे गुजर गए और नियत समय पर मैं अपने बोइंग 777 में जाकर बैठ गयी। कैरिज वे से विमान में जाते हुए मेरी नज़र विमान के घूमते हुए प्रोपेलर्स पर भी पड़ी। उन्हें देखकर उत्साह दोगुना हो गया। मुझे हमेशा से विमान का टेक ऑफ करना बहुत ही एक्ससाइटिंग लगता है फिर इस बार तो बहुत बड़ा विमान था। विमान पहले धीरे फिर तेज़ और फिर बहुत तेज़ हुआ और फिर आसमान में उड़ गया। दिल्ली की ऊँची ऊँची इमारतें लगातार छोटी होती जा रही थीं और मैं अपने आप को पंछी सा महसूस कर रही थी। सचमुच आसमान की ऊंचाई से मेरी दिल्ली बड़ी खूबसूरत दिखती थी। मेरी सीट के सामने लगे टीवी स्क्रीन पर लगातार विमान  गति और उसकी धरती  से ऊंचाई बढ़ती जा रही थी। हालाँकि मेरी उड़ान आधी रात की थी फिर भी मैं अपनी यात्रा का एक भी पल सोकर गंवाना नहीं चाहती थी इसलिए उड़ान के दौरान लगातार मेरी सीट के आगे लगे टीवी स्क्रीन पर मैं दुनिया के नक़्शे को देखती रही कि कब मैं भारत से दूर जा रही हूँ। जब विमान बंगाल की खाड़ी और अन्य समुंद्रों के ऊपर 12000 मीटर की ऊंचाई पर900 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से  उड़ता जा रहा था तो एक बार मलेशिया के लापता विमान का मन को झकझोर देने वाला ख्याल भी आया। बीच बीच में छोटे छोटे आइलैंड्स पर टिमटिमाती हुई रोशनियाँ देखकर लगता था कि जाने ये कौनसा देश होगा। यहाँ कौन लोग रहते होंगे और कैसे होंगे। सिंगापुर एयरलाइन्स के उस विमान की परिचारिकाएं काफी खुशमिज़ाज थी और प्लास्टिक नहीं बल्कि नेचुरल स्माइल के साथ दौड़ दौड़ कर अपना काम कर रही थी। उनमे से एक तो शैली नाम की भारतीय एयरहोसटेस  भी थी विमा के टेक ऑफ करते ही हमारी सीटों पर स्टिकर चस्पा कर दिए गए थे क्योंकि हमें शुद्ध शाकाहारी जैन मील की दरकार थी। विमान में खाना भी सबसे पहले हमें ही दिया गया। उड़ान के दौरान सिंगापोर एयरलाइन्स द्वारा दिया गया शाकाहारी जैन डिनर। इसमें तीन चीज़ें बड़ी मज़ेदार थी। रोटी के साथ साथ बन भी था। सलाद में करीने से कटी लाल शिमला मिर्च थी जो आश्चर्यजनक रूप से खाने में स्वाद भी लग रही थी।मीठे में बिना दूध के मीठे जंवें (सेंवियां ) भी बहुत स्वादिष्ट थीं सुबह ज़रा सी रौशनी देखते ही मैंने अपनी खिड़की शटर उठाकर नीचे झाँका तो नीचे का नज़ारा बड़ा खूबसूरत था।नीचे नीला समंदर  जिसमे खूब सारे जहाज खड़े थे पर इतनी ऊपर से तो वो किश्तियों जैसे लग रहे थे।  विमान के अंदर देखा तो लाइन सी लगी नज़र आई।  पहले  कुछ समझ नहीं आया फिरध्यान दिया कि वो वाशरूम यूज़ करने वालो की  लाइन थी। अचानक भारतीय रेल याद हो आई। फिर सोचा कि विमान की खिड़की से बाहर देखना ही बेहतर है। और इस तरह  इस साढ़े पांच घंटे की यात्रा पूरी करके आख़िरकार मैं एक नए देश में उतरने को तैयार थी।