Thursday, December 27, 2012

कभी खाव्ब में देखते थे जिसे,
       आज हकीक़त बन सामने है वो.
डर लगता है छूने से उसे,
          गर ख्वाब ही हुआ, और टूट गया तो....
पारुल  

Wednesday, December 19, 2012

वो असहाय सी


आज कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी जो 17 वर्ष की उम्र में लिखी थी.


वो असहाय सी 
वो असहाय सी खड़ी, कभी मुझे तो कभी मेरे कपड़ो को देखती थी.
सर्द रात में एक नज़र मैंने उसके शरीर पर डाली,
जिसे वो उस फटी चादर से ढकने का प्रयास कर रही थी.
एक तरफ थी वो,
फटे कपड़ो में  झाकते तन को सर्द रात में कांपते हाथो से छुपाती.
और एक तरफ था मैं,
महंगे कपडे,महंगे जूते,
और हाथ में कार की चाबी.
पहले सोचा 10 रूपये दूँ और चलता करूँ,
पर फिर उसकी आँखों में देखकर जाने क्या हुआ मुझे,
और मैं उस सुनसान जगह पर अपनी कमीज़  उतारने लगा.
मुझे ऐसा करते देख, 
वो डरी, सहमी, पर वहीँ खड़ी रही.
मैंने पास जाकर कमीज़ उसके बदन पर डाल दी.
वो फटी आँखों से एकटक  मुझे देखती रही.
 फिर बोली,
बाबूजी माफ़ कर दो. 
उनके जैसा समझा था,
जो कमीज़ उतारते है और  
 थोड़ी देर बाद 10 रूपये देकर चलता करते है.
मैं बुरी तरह हिल गया,
अमीरी में रहने वाला मैं,
ये सोचने पर मजबूर हो गया,
क्या गरीबी इतनी निर्दयी हो सकती है? 
पारुल 

Friday, December 14, 2012

उजाला आया, अँधेरा गया,
देखो जादू देखो.
सूरज आया, चाँद गया,
देखो जादू देखो.
हिम्मत और बुलंद इरादे हुए,
परेशानी और डर गया,
देखो जादू देखो.
पारुल 

Tuesday, December 11, 2012

ओस से भीगे पत्तों पर, चमकीली गर्म रेतों पर.
ज़िन्दगी हर जगह है दोस्तों, जहाँ देखों वहां पर.
पारुल 

Monday, December 10, 2012

शाम के धुंधलके में एक चेहरा दिखाई देता है,
कहीं वो आप तो नहीं, न जाने क्यों ऐसा लगता है. 
पारुल 

Saturday, December 8, 2012

आज आसमान का रंग कितना गहरा है,
उस पर बादलों का जो पहरा है.
चाँद लम्हों में बरस कर हट जायेंगे ये बादल,
देखो आसमां भी तो यही कह रहा है.
पारुल