संस्कृति भूलते हम
सोमवार को तीज
थी। माँ का
फोन आया कि
आज खीर पूरी
बना लेना, लाल
चूड़ियाँ पहन लेना,
बनाव सिंगार कर
लेना और मेहंदी
लगवा लेना। मुझे
ये सब थोड़ा
अजीब लगा। खीर
पूरी बनाना मतलब
एक्स्ट्रा केलोरीज़ खाना और
लाल चूड़ियाँ, बनाव
सिंगार करना मतलब
एक्स्ट्रा टाइम खर्च
करना। सासू माँ
के स्वर्गवासी होने
और महानगर में
एकल परिवार में
रहने के कारण
माँ ही मुझे
इन सब रीति
रिवाज़ों से समय
समय पर अवगत
कराती रहती हैं।
पिछले दिनों सावन
के दिनों में
जब माँ मेरे
घर पर आई
थी तो भी
मुझे सावन के
कुछ गीत सुनाकर
गयी थी। तो
अनायास ही ये
गीत मैं भी
उनके साथ ही
गुनगुनाने लगी थी।
मुझे ये गीत
सुनने में बड़े
ही मधुर लगते
है। माँ मुझे
साथ में इन
लोकगीतों का मतलब
भी बताती रहती
हैं। एक दिन
उन्होंने मुझे कहा
कि तुम भी
इन गीतों को
सीख लो। काम
आएंगे। वो बताती
हैं कि पार्क
में रोज़ शाम
को उनकी उम्र
की महिलाएं इकठ्ठा
होती हैं और
वे सब मिलकर
भजन या गीत
गाती हैं। आजकल
सावन हैं तो
सावन के गीत
गाती हैं जब
फागुन आएगा तो
फागुन के गीत
गाएंगी। लेकिन वो साथ
ही ये भी
कहती है कि
उनकी पीढ़ी के
बाद कौन इन
लोक गीतों को
संजोयेगा ? क्योंकि उनके अनुसार
आजकल की बहु
बेटियो को तो
इन गीतों में
दिलचस्पी कम ही
है। आजकल के
बच्चे क्या जाने
कि सावन के
दिनों में मोर
पपीहा बोलते है।
आजकल के बच्चे
तो बस ये
जानते है कि
सावन में पानी
टिप टिप बरसता
है जो आग
लगा देता है।
उनकी बात में
भी दम था।
उनकी कही बातों
को सुनकर मैंने
भी सोचा कि
सच ही तो
कह रही हैं
वो। ये छोटे
छोटे त्यौहार कैसे
हमारे जीवन से
निकलते जा रहे
है हमें पता
भी नहीं चल
रहा। इनकी अहमियत
बस मोबइल में
सन्देश के आदान
प्रदान जितनी ही रह
गयी है। हम
अपने रोजमर्रा के
काम में इतने
मसरूफ हो जाते
है कि ये
सब त्यौहार हमें
बेकार का आडम्बर
लगने लगते हैं।
लेकिन अगर देखा
जाए इन्ही तीज
त्योहारों के ज़रिये
ही तो हम
अपनी संस्कृति से
रूबरू होते हैं।
ये त्यौहार हमें
अपने रोज़ के
उस बोझिल माहौल
से बहार निकल
कर तरोताज़ा होने
का मौका देते
हैं । ध्यान
दें तो हम
पाते हैं कि
किटी पार्टी में
आयोजित छोटे छोटे
तीज फ़ंक्शंस भी
हमारे त्योहारों को
बचाये रखने में
छोटा सा योगदान
देते है। पर्यटन
मंत्रालय द्वारा आयोजित तीज
मेले भी हमारी
इसी संस्कृति को
बचाये रखने की
कोशिश है जिसे
हम भूलते जारहे
है।
अंत में माँ
द्वारा सुनाये एक लोक
गीत की कुछ
पंक्तियाँ
सावन आया अम्मा
मेरी रंग भरा
जी ,
एजी कोई आई
हरियाली तीज,
घर घर
झूला झूले कामिनी
जी