Tuesday, April 14, 2015

संस्कारों की ताक़त

संस्कारों की ताक़त
भारत एक विकासशील देश है। यहाँ पर अगर विदेशी कम्पनियाँ आकर पूँजी लगाकर कोई कारखाना लगाती हैं तो निश्चित रूप से भारत को मुनाफा होता है और साथ ही स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिलता है। मेरा भी यही सोचना था लेकिन इसके साथ कई मुश्किलें भी जुडी हुई है। जिनका अंदाज़ा मुझे कुछ दिन पहले हुआ।

कुछ दिन पहले मैं दिल्ली से जयपुर सड़क मार्ग से गयी।  दिल्ली जयपुर हाइवे पर स्थित नीमराणा में मैंने जापानी होटल और रेस्त्रां देखा। ये देखकर मुझे थोड़ी हैरानी हुई। मैंने वहां स्थित कई ढाबे भी देखे जिन पर बढ़िया शाकाहारी और मांसाहारी भोजन उपलब्ध था। ऐसे ही एक ढाबे पर हमने गाडी रोकी। ढाबे वाला नीमराणा का स्थानीय निवासी था। उसका घर वहीँ नीमराणा में स्थित एक गाँव में था। उत्सुकतावश जापानी होटल और रेस्त्रां के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यहाँ एक जापानी कंपनी का एयर कंडीशनर बनाने का कारखाना है  इसलिए यहाँ बड़ी संख्यां में जापानी रहते हैं। उनके लिए यहाँ हर तरह की सुख  सुविधाएँ मौजूद है। इस तरह यहाँ और भी कई विदेशी कंपनियां है जिनके कर्मचारियों के लिए अलग से होटल हैं और उनके यहाँ खायी जाने वाली डिसेज़ के रेस्त्रां है। यहाँ कोरियन और फ्रेंच कंपनिया कुछ ही समय में अपने पूरे लाव लश्कर के साथ रही है। मैंने उस ढाबे वाले से पूछा कि क्या इस तरह विदेशी कंपनियों का यहाँ भारत में आना यहाँ के लिए ठीक है? तो वो झट से बोला कि बहुत बढ़िया है जी इसकी वजह से पिछले कुछ सालों में यहाँ ज़मीन के दाम बेतहाशा बढे हैं। साथ ही स्थानीय लोगों को रोज़गार मिला है। अब उन्हें रोज़गार के लिए दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ता।  फिर, ये कंपनिया सैलरी भी अच्छी देती हैं।तो इससे लोगों के रहन सहन का स्तर भी ऊँचा हो रहा है। तो और क्या चाहिए ? मैंने कहा कि इस तरह यहाँ ढेर सारी  इंडस्ट्री लगाना क्या ठीक है? मेरी इस बात ने तो जैसे उसकी दुखती राग पर हाथ रख दिया।  कुछ देर चुप रहकर वो बोला कि यहाँ बहुत से ग्रामीणों ने अपनी भूमि बहुत महंगे दामों में बेच दी।  लोग बर्बाद भी हुए हैं। मैंने पूछा कि वो कैसे, तो उसने बताया कि यहाँ बहुत से ऐसे किसान थे जिन्हे अपनी भूमि बेचकर बहुत सा पैसा मिला। इतना पैसा अचानक मिल जाने से उन्हें समझ नहीं आया कि वो इस पैसे का सही इस्तेमाल कैसे करें। कई किसानों और उनके बच्चों ने काम करना बंद कर दिया और महँगी कार और अन्य भौतिक सुख सुविधाओं में ये रकम जमकर खर्च की।  हश्र ये हुआ कि कई किसान और उनके परिवारों के पास पैसा खत्म हो गया और अब उन्हें कोई छोटी मोटी नौकरी कर पड़ रही  है क्योंकि वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं और उन्हें किसानी के अलावा कुछ करना भी नहीं आता लेकिन किसानी के लिए ज़मीन अब उनके पास रही नहीं। अंत में उसने कहा। मैडम, सबसे ज़रूरी चीज़ है अच्छे संस्कार। अगर किसी माता पिता ने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए हैं तो  वो परिवार कभी बर्बाद नहीं हो सकता।    

सहज और सरल जैनी

सहज और सरल जैनी
जैन धर्म का इतिहास हिन्दू धर्म की तरह बहुत पुराना है। अहिंसा परमो धर्मः यानि हम लोग अहिंसा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते है। मन, वचन और काया: तीनो प्रकार से अहिंसा। यानि किसी को भी हानि पहुँचाना , यहां तक कि बुरा बोलने को भी हमारे धर्म में हिंसा करना माना जाता है। अमूमन जैनी लोग धनी माने जाते है।  कोई भी ऐतिहासिक जगह देखे तो वहां हमें जैन धर्म से सम्बंधित कुछ कुछ अवशेष मिल जायेंगे। अभी कुछ समय पहले मैं जैसलमेर गयी तो वहां पर सन 1805 में बनी पटुओं की हवेली देखी। यहाँ पांच जैन भाइयों की पांच सुन्दर हवेलियां हैं। इसमें से एक हवेली को म्यूजियम का रूप दे दिया गया है।  मैंने वहां देखा कि  उस समय के हिसाब से एक से एक नायाब चीज़ें वहां रखी थी।  यहाँ तक की कैमरा जैसे कुछ चीज़े तो विदेश से आयातित थी। जैन मंदिरों की भव्यता देखकर ये कहा जा सकता है कि जैन लोग प्राचीन काल से समृद्ध और कला प्रेमी लोगों में आते है। लेकिन साथ ही इस कौम में दान और त्याग की भावना ज़बरदस्त है। मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ आदि बनवाने में जैन लोग अग्रणी माने जाते है। 
हालाँकि जैन धर्म के लोगों का कठिन तप कई बार चर्चा का विषय बनता है।  परन्तु इस पंथ में कहीं भी किसी से ये ज़बरदस्ती नहीं की गयी कि वह कठिन तप करें।  मुख्य रूप से जैन धर्म के दो पंथ कहे जाते हैं, दिगंबर और शेताम्बर। श्वेताम्बर का अगर शाब्दिक अर्थ देखें तो श्वेताम्बर अर्थात वे जो सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं और दिगंबर अर्थात वे जिनके लिए धरती उनका बिछौना और आकाश ही ओढ़ना है। शेताम्बर और दिगंबर साधु इसी परिभाषा के अनुसार रहते हैं। 
जैन धर्म  में मुख्य रूप से अपनी इन्द्रियों को वश में करने  और सांसारिक मोह माया को त्यागने पर बल दिया गया है।
विकिपीडिया के अनुसार जैनियों की साक्षरता दर 94 .1% है  जबकि राष्ट्रीय औसत 65. 38 % है। इससे पता चलता है कि जैन लोग साक्षरता पर पूरा बल देते हैं। इसी के साथ जैन लोग अपनी बेटियों को भी साक्षर बनाने में पूरा यकीन रखते हैं इसलिए जैन लड़कियों की साक्षरता दर 90. 6 % जबकि राष्ट्रीय  दर  54.16% है। जैनियों के लिए कहा जाता है कि ये कौम मुख्यतः व्यापर में ही सलग्न होती है। लेकिन इसके साथ ही जैन युवा कई प्रतिष्ठित पदों पर काबिज़ हैं। फिर चाहे वह टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के विनीत जैन हो या डचेज़ बैंक के सीईओ अंशु जैन।
आम तौर पर कहा जाता है कि जैन लोग दिखावे में यकीन रखते हैं। और साथ ही ये लोग खाने को लेकर बहुत सेलेक्टिव होते हैं। कुछ हद तक ये बात सही है। परन्तु अब की जैन युवा पीढ़ी काफी लचीली है। उसे अपने संस्कारों और नए ज़माने के बीच बेलेंस बनाना गया है।

जैनियों में पहले भी दूसरी जाति में प्रेम विवाह होते रहे हैं लेकिन अब ये दर और भी ज्यादा बढ़ गयी है क्योंकि माता पिता अब अपने बच्चों की पसंद को ख़ुशी से स्वीकारने लगे हैं।