वो बहादुर बेटी
पाकिस्तान की मनोहारी स्वात घाटी में रहने वाली
किशोरी मलाला युसुफजई पर बीते मंगलवार को तालिबानी लड़ाकों द्वारा किये गए हमले की जितनी निंदा की जाये, कम है. चौदह वर्षीया मलाला स्वात घाटी में लड़कियों के विद्यालय जाने पर पाबन्दी लगाने वाले तालिबान के फैसले के खिलाफ खड़ी हुई थीं. जिस वजह से वह पिछले करीब तीन साल से तालिबान के निशाने पर थी. तालिबान ने करीब तीन वर्ष पहले लड़कियों को शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित करने के लिए उनके विद्यालय जाने और शिक्षा प्राप्त करने पर पाबन्दी लगा दी थी जिसकी वजह से मलाला भी स्वात घाटी की अन्य लड़कियों की तरह विद्यालय नहीं जा पा रही थी.
परीक्षा में अव्वल रहने वाली और विद्यालय के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ चढ़ कर हिस्सा लेने वाली मलाला ने विद्यालय न जा पाने की अपनी इसी कसक और पीड़ा को बी बी सी उर्दू पर गुल मकाई नाम से एक ऑनलाइन डायरी (ब्लॉग) की शक्ल में बयान कर दिया. इस डायरी में उन्होंने अपने और अपने जैसी कई किशोरियों की मनोव्यथा को बयान किया. जिसे दुनियाभर में कई लोगों ने पढ़ा. उनकी इसी डायरी ने उन्हें पिछले साल अन्तराष्ट्रीय बाल शांति पुरुस्कार के लिए नामांकन भी दिलवाया जोकि बाल अधिकारों से जुड़ा सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है. इसके साथ साथ उन्हें वीरता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया.
उनके अथक प्रयासों से स्वात घाटी में बालिकाएं फिर से विद्यालय जा पा रही थीं. लेकिन मलाला पर गोली चलाकर तालिबान ने ये साबित कर दिया कि वे आज भी नहीं बदले और शायद बदलेंगे भी नहीं क्योंकि शायद वह बदलना ही नहीं चाहते. तभी तो मालाला पर उन्होंने कातिलाना हमला किया. लेकिन मलाला बहुत ही निर्भीक और बहादुर लड़की हैं तभी तो अपनी मौत का खतरा जानते हुए भी उन्होंने ऑनलाइन डायरी लिखने की हिम्मत की. उनकी बहादुरी उनकी लिखी डायरी के शब्दों में साफ़ देखी जा सकती है. अपनी डायरी में एक जगह वह लिखती हैं कि स्वात घाटी तालिबान के कब्ज़े में है और तालिबान का विरोध करने वाले दर्जनों लोगों को तालिबानी सरेआम फांसी पर लटका देते हैं. ये भी उन्होंने तब लिखा है जब वे महज़ ग्यारह साल की थी.
अपने और अपने जैसी बालिकाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ पाकिस्तान जैसे देश में एक ग्यारह वर्षीया बालिका का विरोध का स्वर बुलंद करना अपने आप में एक बहुत बड़ी और प्रशंसनीय बात है. ये इस बात का प्रतीक है कि पाकिस्तान में अब किशोर होते बच्चे अपना भला बुरा समझने लगे है और अपने साथ हो रहे अत्याचार का विरोध कर पाने में सक्षम है.खुद मलाला ने अपने एक इंटरव्यू के दौरान ये इच्छा जताई थी कि वे शिक्षा से वंचित लड़कियों के लिए एक वोकेशनल इंस्टीटयूट खोलना चाहती हैं जिससे वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. साथ ही वह यह भी चाहती हैं कि लोग स्वात घाटी के लोगों को आतंकवादी न मानकर शांत और प्यारे लोगों के रूप में जानें.
कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते है. मलाला के इस हौंसले से ये नज़र आ रहा है कि पकिस्तान के बच्चे वहां हो रहे खून खराबे से तंग आ चुके है और अब वह भी खुली हवा में सांस लेना चाहते है.वे ये जानते है कि लोगों में जागरूकता आ रही है और स्त्री पुरुष का भेद भाव खत्म होता जा रहा है. वे देख रहे हैं कि दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है और वो भी ज़माने के साथ कदम से कदम मिला
कर चलना चाहते हैं. वे जानते है कि शिक्षा विचारों को विस्तार देने के साथ साथ
तरक्की के नए रस्ते खोलती है और वे शिक्षा के रास्ते खुद की और अपने देश की तरक्की
चाहते है और अपनी मंजिल को पाने के लिए वे हर तरह की मुश्किल का सामना करने को
तैयार है.
यहाँ ये बात भी देखने योग्य है कि मलाला के साथ हुए इस शर्मनाक कांड के बाद लाखों हाथ उनकी सलामती की दुआ में उठ गए.जिससे ये साफ़ है कि पकिस्तान की जनता मलाला द्वारा किये गए काम को सही मानते हुए उसकी प्रशंसा करती है और इस मुश्किल घडी में पूरी तरह से मलाला के साथ है.ये बात पाकिस्तानी जनता की एकता को दर्शाती है. पाकिस्तान सरकार ने भी तत्परता दिखाते हुए मलाला को अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधाएँ दी. साथ ही मलाला पर हमला करने वाले की जानकारी देने वाले को एक करोड़ पाकिस्तानी रूपये देने की घोषणा भी की. पी पी पी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने मलाला को अपनी और हर शांतिप्रिय पाकिस्तानी नागरिक की बहन बताते हुए उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की. इस बात को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में सचमुच फिजा बदल रही है.